इतने बेचैन रहते हैं ट्रंप कि कंट्रोल रूम से ही कर दिए गए बाहर, जल्दबाजी से डरी टीम
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की बेचैनी सामने आई। उन्हें ईरान में अमेरिकी एयरमैन को ...और पढ़ें
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जैसे-जैसे दो हफ्ते का सीजफायर खत्म होने की घड़ी नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे अमेरिकी सत्ता के भीतर छिपी बेचैनी भी सामने आने लगी है। द वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट एक ऐसी तस्वीर पेश करती है, जहां दुनिया के सबसे ताकतवर देश का राष्ट्रपति खुद अपनी ही टीम के भरोसे से बाहर खड़ा नजर आता है।
ईरान में फंसे अमेरिकी एयरमैन को बचाने के संवेदनशील ऑपरेशन के दौरान हालात इतने नाजुक थे कि ट्रंप के सहयोगियों ने उन्हें कंट्रोल रूम से दूर रखना ही सही समझा। वजह थी उनकी अधीरता और जल्दबाज फैसलों का खतरा। आपरेशन के हर मिनट की जानकारी मिल रही थी, लेकिन ट्रंप को केवल उतनी ही सूचना दी जा रही थी, जितनी जरूरी समझी गई।
गुस्सा और जल्दबाजी पूरे मिशन को जोखिम
सहयोगियों को डर था कि अगर राष्ट्रपति हर पल की जानकारी में शामिल हुए, तो उनका गुस्सा और जल्दबाजी पूरे मिशन को जोखिम में डाल सकती है। दरअसल, मार्च में जब एक अमेरिकी एफ-15 फाइटर जेट को ईरानी बलों ने मार गिराया, तो ट्रंप का गुस्सा फूट पड़ा।
उन्होंने घंटों तक अधिकारियों पर नाराजगी जताई और तुरंत दोनों पायलटों को सुरक्षित बाहर निकालने का दबाव बनाया। लेकिन सच्चाई यह थी कि 1979 के बाद से अमेरिका की ईरान की जमीन पर सीधी मौजूदगी नहीं रही है, ऐसे में यह मिशन केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक और भौगोलिक जोखिमों से भी भरा हुआ था।
1979 की परछाई, सैनिकों की चिंता और बिखरती रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे गहरी छाया थी 1979 ईरानी बंधक संकट की, जिसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी विदेश नीति विफलताओं में गिना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप बार-बार उस दौर का जिक्र करते हुए अपने अधिकारियों को चेताते रहे कि ऐसी स्थिति उनके कार्यकाल को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जैसा कि उस समय के राष्ट्रपति जिमी कार्टर के साथ हुआ था।
यही डर उनके भीतर लगातार काम कर रहा था। एक ओर वे ईरान को पूरी तरह तबाह कर देने और खार्ग द्वीप जैसे ठिकानों पर कब्जा करने जैसी कड़ी धमकियां दे रहे थे, तो दूसरी ओर भीतर ही भीतर युद्ध को लेकर असहज और सशंकित भी थे।
रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप को इस बात का गहरा डर सता रहा था कि अगर सैनिकों को सीधे युद्ध में भेजा गया, तो कई जवान जिमदा वापस नहीं लौटेंगे और यही किसी भी राष्ट्रपति के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक और मानवीय संकट बन सकता है।
इसके बावजूद वे कई बार अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की राय के बिना ही बड़े और जोखिम भरे बयान दे रहे थे, यहां तक कि ईरानी सभ्यता को खत्म करने जैसी बातें भी सामने आईं।
रणनीतिक दबाव में ट्रंप
हालांकि, उनके करीबी सहयोगी इसे एक रणनीतिक दबाव के तौर पर देखते हैं, जिससे ईरान को बातचीत की मेज पर लाया जा सके। ट्रंप की भूमिका गंभीर सवालों के घेरे मेंदिलचस्प रूप से, ट्रंप खुद मानते हैं कि ईरान जैसे देशों से निपटने के लिए डर और अपमान की भाषा ही असर करती है और इसी सोच के तहत वे लगातार आक्रामक बयान देते रहे।
लेकिन इसी के साथ उनकी एक और तस्वीर सामने आती है जहां वे युद्ध से ध्यान हटाकर दूसरे मुद्दों पर जाने की इच्छा जता रहे हैं और पूरे संघर्ष को आंकड़ों में मापते हुए यह गिन रहे हैं कि कितने ईरानी ठिकाने तबाह हुए।
पश्चिम एशिया का यह संकट अब केवल हथियारों की जंग नहीं रह गया है, बल्कि यह नेतृत्व की स्थिरता, धैर्य और निर्णय क्षमता की परीक्षा बन चुका है और इस परीक्षा में ट्रंप की भूमिका अब गंभीर सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है।
