ट्रंप का ड्रीम प्रोजेक्ट 'गोल्डन डोम': दुर्लभ धातुओं के खजाने पर रूस-चीन की नजर, ग्रीनलैंड समझौते से कैसे बिगड़ा गणित?
अमेरिका-ग्रीनलैंड 'इन्फिनाइट लाइफ' समझौता केवल द्वीप की सुरक्षा नहीं, बल्कि रूस-चीन को रोकने के साथ-साथ दुर्लभ खनिजों और मिसाइल रक्षा प्रणाली पर दबदबा बनाने का मास्टरस्ट्रोक भी है।

ट्रंप का ग्रीनलैंड समझौता।
HighLights
अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर मिला स्थायी नियंत्रण।
समझौता चीन-रूस को आर्कटिक से बाहर रखने की रणनीति।
ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार मौजूद है।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बार फिर आर्कटिक महासागर के ठंडे पानी में गर्माहट आ गई है। वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक ऐतिहासिक 'इन्फिनाइट लाइफ' समझौते का एलान किया है। इस डील के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर 'स्थायी नियंत्रण' मिल गया है।
बड़ी बात यह है कि इस समझौते से केवल ट्रंप को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर स्थाई नियंत्रण ही नहीं मिला है, बल्कि चीन और रूस की घेराबंदी के लिए मास्टरस्ट्रोक माने जाने वाला यह समझौता अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को पूरी तरह से बदलने की ताकत भी रखता है।
केवल एक द्वीप की सुरक्षा तक नहीं सीमित है यह समझौता...
अब इस बात में तो कोई दोहराई नहीं है कि देखने और सुनने में भले ही यह एक आम रक्षा समझौते की तरह लगे, लेकिन इसके सामरिक मायने बेहद गहरे हैं। इस बात को ऐसे समझिए कि यह डील महज एक द्वीप की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के महायुद्धों, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और वैश्विक खनिज बाजार पर वर्चस्व की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा भी है।
अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर इस एक समझौते से वैश्विक कूटनीति की पटल से लेकर महायुद्धों तक कैसे प्रभावित हो सकते हैं? दूसरी बड़ी बात आखिर ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ अमेरिका के इस समझौते से रूस और चीन चिंता में क्यों है? इतिहास क्या कहता है, भूगोल का तर्क क्या है? आइए हम आपको बताते हैं...
पहले समझिए क्या है यह 'इन्फिनाइट लाइफ' समझौता?
बता दें कि सालों से ग्रीनलैंड पर अपना अधिकार पाने के जद्दोजहद में लगे अमेरिकी राष्ट्रपति ने डोनल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक ऐतिहासिक 'इन्फिनाइट लाइफ' समझौते का एलान किया।
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अपने पोस्ट में ट्रंप ने इसे एक ऐसा समझौता बताया है जिसका कोई अंत नहीं है और जो अमेरिका को बिना किसी लागत के मिला है। इसके तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी एक बड़ी सैन्य उपस्थिति विकसित करेगा।
डेनमार्क ने तो साफ कर दिया अपना स्टैंड
हालांकि दूसरी ओर डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने साफ किया है कि इस समझौते से अमेरिका को ग्रीनलैंड पर संप्रभुता नहीं मिली है। यह मुख्य रूप से आर्कटिक और उत्तर अटलांटिक क्षेत्र की साझा सुरक्षा को मजबूत करने और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करने वाला अरेंजमेंट है।
अच्छा, बात अब अगर वर्तमान स्थिति की करें तो यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि अमेरिका के पास 1951 की एक संधि के तहत पहले से ही इस द्वीप पर सैन्य ठिकाने और ओवरफ्लाई अधिकार प्राप्त हैं। दूसरी ओर इस नए समझौते के दस्तावेजों पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
अब ग्रीनलैंड की अहमियत और गोल्डन डोम का कनेक्शन क्या?
इस बात को ऐसे समझिए कि इस पूरे समझौते के केंद्र में अमेरिका की महत्वाकांक्षी योजना 'गोल्डन डोम' है, जो एक बहु-स्तरीय मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। इसका उद्देश्य अमेरिका की ओर आने वाली बैलिस्टिक, क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइलों को रास्ते में ही हवा में तबाह करना है।
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अहम बात यह है कि रूस से अमेरिका की ओर लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों का सबसे छोटा रास्ता उत्तरी ध्रुव के ऊपर से होकर गुजरता है और ग्रीनलैंड ठीक उसी रास्ते के नीचे स्थित है, जो कि अब अमेरिका के लिए बड़ा हथियार बनने वाला है।
अमेरिका के केंट्रोल में क्या-क्या होगा?
देखिए एक बात को साफ है कि अब ध्रुव के करीब रडार, सेंसर और इंटरसेप्टर तैनात होने से अमेरिकी सेना दुश्मन की मिसाइल को उसकी उड़ान के शुरुआती चरण में ही ट्रैक और नष्ट कर सकेगी।
दूसरी अहम बात यह भी है कि आर्कटिक सर्कल में स्थित यह बेस, जिसे पहले 'थ्यूले' कहा जाता था...पहले से ही रूस और चीन की मिसाइल गतिविधियों पर पैनी नजर रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
रूस और चीन चिंता में क्यों है?
कुल मिलाकर इस समझौते का दूसरा और सबसे कड़ा पहलू यही है कि अमेरिका के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों रूस और चीन को आर्कटिक से पूरी तरह बाहर रखना है।
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अब ये आसान इसलिए हो गया है, क्योंकि नए समझौते के तहत कोई भी अमेरिकी विरोधी देश ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा नहीं बना सकता, सेना तैनात नहीं कर सकता और न ही कोई संवेदनशील निवेश कर सकता है। इसका मतलब साफ है कि अब चीन की कोई भी कंपनी बिना अमेरिकी अनुमति के ग्रीनलैंड के किसी बंदरगाह या खदान में हिस्सेदारी नहीं खरीद पाएगी।
दुर्लभ खनिजों का खजाना कहां जाएगा?
ग्रीनलैंड के भूगर्भीय सर्वे के अनुसार, इस द्वीप पर करीब 3.6 करोड़ टन दुर्लभ खनिज, तांबा, निकल, ग्रेफाइट और टंगस्टन जैसे कीमती संसाधन मौजूद हैं। दूसरी तरफ वर्तमान में दुनिया के कुल दुर्लभ खनिजों का लगभग 60% हिस्सा चीन पैदा करता है और 85% प्रोसेसिंग पर उसका नियंत्रण है। ऐसे में अब पश्चिमी देश इस एकतरफा निर्भरता को खत्म करने के लिए ग्रीनलैंड को एक मजबूत विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
