ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब को 48 F-35 जेट बिक्री की मंजूरी दी; इजरायल चिंतित, चीन सबसे बड़ा खतरा
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन ने सऊदी अरब को दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमान एफ-35 की बिक्री को मंजूरी ...और पढ़ें

ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब को 48 F-35 जेट बिक्री की मंजूरी दी (फोटो- रॉयटर)
HighLights
इजरायल ने 50 एफ-35 खरीदे थे, जिनमें से करीब 48 जमीन पर हैं
24.3 अरब डॉलर के इस सौदे के तहत 48 जेट, इंजन और सपोर्ट सिस्टम दिए जाएंगे
डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन ने सऊदी अरब को दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमान एफ-35 की बिक्री को मंजूरी दे दी है। 24.3 अरब डॉलर के इस सौदे के तहत 48 जेट, इंजन और सपोर्ट सिस्टम दिए जाएंगे। इससे सऊदी अरब मध्य पूर्व में इजरायल के बाद दूसरा देश बन जाएगा जो एफ-35 उड़ाएगा।
अमेरिकी कांग्रेस को इस संभावित बिक्री की सूचना दे दी है। हालांकि, सऊदी जेटों में इजरायल के एफ-35I (अदीर) जैसी सभी उन्नत सुविधाएं नहीं होंगी। इजरायली संस्करण को आईडीएफ ने खास तौर पर संशोधित किया था।
इजरायल क्यों चिंतित?
इजरायल ने 50 एफ-35 खरीदे थे, जिनमें से करीब 48 जमीन पर हैं। अब सऊदी को भी इतनी ही संख्या मिलने वाली है। हालांकि इजरायल 2028 से 25 और जेट खरीदने की योजना बना रहा है।
असली चिंता संख्या की नहीं, बल्कि गुणवत्ता के कमजोर होने की है। अमेरिका लंबे समय से इजरायल की इस बढ़त को बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। कुछ इजरायली अधिकारियों ने कहा था कि सौदा सऊदी-इजरायल सामान्यीकरण से जुड़ा होना चाहिए, लेकिन अभी तक कोई ऐसा समझौता नहीं हुआ।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हालांकि इसकी अहमियत को कम करके आंका है। वॉशिंगटन का दावा है कि यह बिक्री क्षेत्रीय सैन्य संतुलन नहीं बिगाड़ेगी।
चीन सबसे बड़ा खतरा
अमेरिका में सबसे मजबूत आपत्ति चीन को लेकर है। रक्षा खुफिया एजेंसी के आकलन में सवाल उठाया गया है कि एफ-35 तकनीक वाले ठिकानों की सुरक्षा अमेरिकी और सऊदी कर्मी कितनी अच्छी तरह कर पाएंगे। सऊदी ठिकानों पर चीनी सैन्य कर्मियों की पहुंच और राज्य की दूरसंचार व रक्षा व्यवस्था में चीनी तकनीक का भारी इस्तेमाल चिंता का विषय है।
कांग्रेस के एक डेमोक्रेट सदस्य राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि यह अमेरिकी सैन्य तकनीक के सबसे कीमती हिस्से को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की पहुंच में ला सकता है। पहले यूएई को एफ-35 बेचने का सौदा भी चीन से संबंधों की वजह से रुक गया था।
इजरायल के लिए जोखिम अप्रत्यक्ष है। सऊदी अरब ईरान को रहस्य नहीं सौंपेगा, लेकिन तीसरे पक्ष (खासकर चीन) के जरिए लीकेज की आशंका बनी हुई है।
खाड़ी देशों में अमेरिका के वादों पर विश्वास कमजोर हुआ है। 2019 में सऊदी तेल रिफाइनरियों पर हमला, 2022 में यूएई पर हूती ड्रोन हमले और 2026 के ईरान युद्ध ने इस अविश्वास को और बढ़ाया। खाड़ी नेताओं को लगा कि अमेरिका और इजरायल ने उनसे सलाह लिए बिना कार्रवाई की।
इस बीच सऊदी अरब मिस्र, पाकिस्तान, कतर और तुर्की के साथ एक गठबंधन बना रहा है, जो अमेरिकी समर्थित यूएई-इजरायल धुरी के मुकाबले खड़ा हो। यूएई के साथ सऊदी की पुरानी प्रतिद्वंद्विता भी बनी हुई है। डिलीवरी में कई साल लगेंगे।
