बदलती सुपरपावर केमिस्ट्री: ट्रंप ने चिनफिंग को दिया बराबर का दर्जा, नाटो-यूरोपीय सहयोगियों की बढ़ी धड़कनें
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अमेरिका की 48 घंटे की राजकीय यात्रा से कोई बड़ा तत्काल समझौता तो नहीं निकला, ...और पढ़ें

ट्रंप ने शी चिनफिंग को बराबर का दर्जा दिया, सहयोगी और आलोचक दोनों चिंतित (फोटो- रॉयटर)
HighLights
ट्रंप बार-बार शी को दोस्त बताते रहे और संबंधों को महान मित्रता करार देते रहे
चीनी नेता की तरफ से व्यक्तिगत स्तर पर कोई खास जवाबी गर्मजोशी नहीं दिखी
डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अमेरिका की 48 घंटे की राजकीय यात्रा से कोई बड़ा तत्काल समझौता तो नहीं निकला, लेकिन इससे साफ हो गया कि वाशिंगटन अब चीन को नई जी-2 व्यवस्था में बराबर का दर्जा दे रहा है।
व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ताइवान, ईरान और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की बातों के बावजूद सबसे महत्वपूर्ण संदेश यात्रा की कोरियोग्राफी में छिपा था।
ट्रंप बार-बार शी को दोस्त बताते रहे और संबंधों को महान मित्रता करार देते रहे। वहीं चीनी नेता की तरफ से व्यक्तिगत स्तर पर कोई खास जवाबी गर्मजोशी नहीं दिखी।
आलोचकों का कहना है कि ट्रंप ने चिनफिंग के सामने झुककर अपनी मांगों को नरम कर दिया। ट्रंप समर्थक इसे अमेरिकी किसानों के हित में बताते हैं, क्योंकि चीन ने सोयाबीन, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की खरीद घटा दी थी।
चाय समारोह में ट्रंप ने कहा कि यात्रा से किसानों को बड़े नतीजे मिले, लेकिन विस्तार से कुछ नहीं बताया। उन्होंने सिर्फ शी के चीन आने के निमंत्रण को स्वीकार किया।
रिपब्लिकन सीनेटर जॉन केनेडी ने शी, रूस, उत्तर कोरिया और ईरान के नेताओं की तुलना सरीसृपों से की। उन्होंने कहा कि मुख्य सरीसृप और क्वार्टरबैक राष्ट्रपति शी हैं। इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
आयोवा के सीनेटर चक ग्रासली ने भी कहा कि अगर सिर्फ व्यापार युद्धविराम ही नतीजा है तो यह कम्युनिस्ट तानाशाह के लिए सिर्फ शो बनकर रह जाएगा।
ताइवान मुद्दे पर कोई सार्वजनिक प्रगति नहीं हुई। ट्रंप ने करीब 14 अरब डॉलर के ताइवान हथियार पैकेज को अभी भी रोक रखा है, जिसे वे बीजिंग के साथ मोलभाव का साधन बता चुके हैं। ईरान पर भी चीन से कोई बड़ा रियायत नहीं मिली। एडवांस्ड चिप्स पर अमेरिका ने अपनी लाइन कायम रखी।
ट्रंप के समर्थक कहते हैं कि पिछले प्रशासन सिर्फ बातें करते रहे, जबकि ट्रंप ने चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ा, पनामा नहर से चीनी प्रभाव हटाया और वेनेजुएला व ईरान जैसे उनके सहयोगियों पर दबाव डाला।
लेकिन आलोचक कहते हैं कि ट्रंप ने टकराव को दो महाशक्तियों के बीच लेन-देन वाले प्रबंधन में बदल दिया है। इससे भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे सहयोगी देशों में बेचैनी बढ़ी है।
