वाशिंगटन, पीटीआइ। जलवायु परिवर्तन और वायुमंडल में लगातार हो रहे बदलावों के कारण पिछले कुछ दशकों में श्वास रोगियों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है। कई बार तमाम चिकित्सकीय उपचार भी रोगी को इससे छुटकारा नहीं दिला पाते। ऐसे में वैज्ञानिकों ने शोध कर इससे बचाव के उपाय बताए हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का दावा है कि उनका यह प्रयोग अभी जानवरों पर सिद्ध हुआ है, लेकिन हो सकता है कि आगामी समय में यह मनुष्यों को भी नई जिंदगी दे।

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि चूहों में घातक फेफड़े संबधी रोगों को जड़ से खत्म करने के लिए जन्म से पूर्व ही उनके जीन में कुछ बदलाव (एडिटिंग) कर इन्हें बचाया गया है, क्योंकि यह बीमारी इतनी घातक है कि जन्म के कुछ घंटों बाद ही शिशु की मौत हो जाती है। साइंस ट्रांसलेशन मेडिसन जर्नल में प्रकाशित वैज्ञानिकों की इस अवधारणा में कहा गया है कि जन्म से पूर्व ही गर्भाशय में किए गए कुछ बदलाव फेफड़े संबंधी रोगों के उपचार के संबंध में नई राह दिखाते हैं।

अमेरिका के फिलाडेल्फिया चिल्ड्रन हॉस्पिटल (सीएचओपी) की शोधकर्ता विलियम एच पेरांतेऊ ने कहा ‘भ्रूण के विकास के दौरान उसके जन्मजात गुण उसे जीन एडिटिंग के लिए अनुकूल बनाते हैं।’ उन्होंने कहा कि जन्म से पहले जीन एडिटिंग करने से रोग से बचाव और उसे कम करने में सहायता मिलती है। गर्भ में ही उसकी विकृतियों ठीक करने की यह प्रक्रिया अपने आप में बेहद रोमांचक है। शोधार्थियों की टीम ने उम्मीद जताई है कि इसके जरिए जन्म से ही फेफड़े स्वस्थ्य रहेंगे।

बाल अस्पतालों में 22 फीसद रोगी श्वास संबंधी:

बाल चिकित्सालयों में लगभग 22 प्रतिशत रोगी श्वसन संबंधी विकारों के भर्ती होते हैं। श्वास रोगियों की अच्छी देखभाल और उनके कारणों की गहरी समझ के बावजूद भी यह जन्मजात विकार बेहद घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि फेफड़ों का बाहरी वातावरण से सीधे संबंध होता है। इसीलिए, दोषपूर्ण जीन को ठीक करने के लिए यह थेरेपी सहायक सिद्ध हो सकती है। आम तौर यह देखा जाता है कि यह जन्मजात श्वास संबंधी रोग सर्फेक्टेंट प्रोटीन की कमी, सिस्टिक फाइब्रोसिस और अल्फा -1 एंटीट्रिस्पिन के कारण होते हैं।

अमेरिका की पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एडवर्ड ई मौरिसे ने कहा कि यह जानना महत्वपूर्ण है कि यह कैसे काम करता है। इस तकनीक के जरिये हम कैसे जीन में बदलाव कर सीधे फेफड़ों के वायुमार्ग की उन कोशिकाओं को ठीक कर सकते हैं जो इन रोगों का कारण बनती हैं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने दिखाया कि चूहे के भ्रूण के विकास के दौरान एमनियोटिक द्रव को (सीआरआइएपीआर) जीन एडिटिंग के जरिये ठीक समय में गर्भाशय में फैलाया गया। इससे चूहे के फेफड़ों में भी परिवर्तन देखा गया। 

Posted By: Dhyanendra Singh

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