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रूस ने अलास्का को कौड़ियों के दाम में बेचा, अब यही मॉस्को के खिलाफ अमेरिका की ढाल बन रहा

Published: Sun, 18 Oct 2026 07:53 PM (IST)

रूस ने 1867 में अलास्का को अमेरिका को 7.2 मिलियन डॉलर में बेचा, जो उस समय एक दूरस्थ और महंगा उपनिवेश था जिसकी रक्षा करना मुश्किल था।

रूस ने अलास्का को कौड़ियों के दाम में बेचा।  (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

रूस ने अलास्का को कौड़ियों के दाम में बेचा। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

HighLights

  1. रूस ने 1867 में अलास्का को अमेरिका को बेचा था।

  2. यह सौदा रूस के लिए रणनीतिक और आर्थिक मजबूरी थी।

  3. आज अलास्का अमेरिका की आर्कटिक सुरक्षा का केंद्र है।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। दुनिया के नक्शे को देखें तो अलास्का कुछ अलग-थलग सा लगता है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका का हिस्सा है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों से दूर है, इसके बीच में कनाडा है और दूसरी तरफ संकरी बेरिंग जलडमरूमध्य के पार रूस है। आखिर इतना बड़ा इलाका अमेरिका का हिस्सा कैसे बन गया?

1867 में, रूसी साम्राज्य ने अलास्का को 7.2 मिलियन डॉलर (सोने के रूप में) में संयुक्त राज्य अमेरिका को बेच दिया। लगभग 600,000 वर्ग मील में फैले इस इलाके के लिए अमेरिका को प्रति एकड़ दो सेंट से भी कम कीमत चुकानी पड़ी। आज पीछे मुड़कर देखें तो यह इतिहास के सबसे बेहतरीन रियल-स्टेट सौदों में से एक लगता है।

लेकिन यह सौदा सिर्फ जमीन को सस्ते में खरीदने तक सीमित नहीं था। रूस के लिए, अलास्का एक दूर-दराज और महंगी कॉलोनी थी, जिसकी रक्षा करना लगातार मुश्किल होता जा रहा था। वहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए यह अपने क्षेत्र और उत्तरी प्रशांत महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाने का एक मौका था। उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि अलास्का का आर्थिक और सैन्य महत्व भविष्य में इतना ज्यादा बढ़ जाएगा।

डेढ़ सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद, यह सौदा इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे एक दौर में रणनीतिक सोच के साथ लिया गया फैसला, दूसरे दौर में सत्ता के संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। अलास्का में रूस की कहानी खोजबीन से शुरू हुई। 1741 में, विटस बेरिंग और अलेक्सी चिरिकोव के नेतृत्व में कुछ अभियान इस इलाके तक पहुंचे, जिससे फर (जानवरों की खाल) का व्यापार करने वालों के लिए उत्तरी प्रशांत महासागर पार करने का रास्ता खुल गया।

इन व्यापारियों का मुख्य लक्ष्य समुद्री ऊदबिलाव था, जिनकी कीमती खाल से एक बहुत ही लाभदायक व्यापार चलता था।

1799 में, जार पॉल प्रथम ने रूस के सभी व्यापारिक कार्यों को 'रशियन-अमेरिकन कंपनी' के तहत एकजुट कर दिया। इस कंपनी को रूसी उत्तरी अमेरिका में व्यापार करने का एकाधिकार दे दिया गया और साथ ही कॉलोनी के प्रशासन की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई।

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, अलास्का, रूस के राजनीतिक और औद्योगिक केंद्रों से हजारों मील दूर स्थित था। इतनी दूर तक भोजन, जरूरी सामान और लोगों को पहुंचाना महंगा और मुश्किल काम था। अमेरिकी नेशनल आर्काइव्स के अनुसार, 'रशियन-अमेरिकन कंपनी' शाही खजाने से मिलने वाली भारी सब्सिडी पर निर्भर थी, जबकि वह खजाना पहले से ही दबाव में था।

इस इलाके में रूस की मौजूदगी भी बहुत सीमित थी। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, यहां स्थायी रूप से बसने वाले रूसियों की संख्या कभी भी 400 से ज्यादा नहीं रही। रूसी सत्ता मुख्य रूप से तटीय बस्तियों और व्यापारिक केंद्रों तक ही सीमित थी। अलास्का को अपने नियंत्रण में रखना महंगा पड़ रहा था। किसी मजबूत विदेशी ताकत से इसकी रक्षा करना और भी ज्यादा महंगा साबित हो सकता था। इसे बिना किसी फायदे के खो देने का डर था। अलास्का को बेचने के पीछे सबसे बड़ा तर्क रणनीतिक था।

1853-1856 के क्रीमियन युद्ध ने रूसी सेना और नौसेना की कमजोरियों को उजागर कर दिया। इस संघर्ष में रूस के मुख्य विरोधियों में से एक, ब्रिटेन का पड़ोसी 'ब्रिटिश नॉर्थ अमेरिका' पर नियंत्रण था, जिसका एक बड़ा हिस्सा बाद में कनाडा बन गया। रूसी अधिकारियों को डर था कि ब्रिटेन के साथ एक और युद्ध होने पर अलास्का पर कब्जा हो सकता है। अगर ऐसा होता, तो रूस को यह उपनिवेश गंवाना पड़ता और बदले में उसे एक पैसा भी मुआवजा नहीं मिलता।

इस इलाके को बेचने के विचार को कई सालों से समर्थन मिल रहा था। 1857 में, जार अलेक्जेंडर द्वितीय के छोटे भाई, ग्रैंड ड्यूक कॉन्स्टेंटिन निकोलायेविच ने तर्क दिया कि इससे पहले कि अमेरिका इन इलाकों पर कब्जा कर ले, रूस को खुद ही अपने उत्तरी अमेरिकी क्षेत्रों को बेच देना चाहिए।

1866 में अलास्का को बेचने का फैसला

दिसंबर 1866 में, अलेक्जेंडर द्वितीय और उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने अलास्का को बेचने का फैसला किया। इस सौदे से तुरंत राजस्व मिलने का वादा था, रूस को एक असुरक्षित इलाके की रक्षा करने के खर्च से छुटकारा मिला, और अलास्का के ब्रिटिश हाथों में जाने का खतरा भी कम हो गया।

इसे संयुक्त राज्य अमेरिका को सौंपने से प्रशांत क्षेत्र की एक उभरती हुई ताकत को मजबूती मिलती, जिसके हित ब्रिटेन के प्रभाव को संतुलित करने में मददगार हो सकते थे। रूस के लिए, इसका हिसाब-किताब सीधा था, भविष्य के किसी युद्ध में अलास्का को खोने का जोखिम उठाने के बजाय, उसे बेच देना ही बेहतर था।

लंबी बातचीत के बाद हुआ समझौता

रात भर चली बातचीत के बाद एक समझौता हुआ। इस बातचीत में दो प्रमुख हस्तियां शामिल थीं, अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम एच. सीवर्ड और वाशिंगटन में रूस के मंत्री एडुआर्ड डी स्टोकेल। राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन ने इस अधिग्रहण का समर्थन किया, जबकि अलेक्जेंडर द्वितीय ने इसके हस्तांतरण को मंजूरी दी।

अमेरिकी नेशनल आर्काइव्स के अनुसार, मार्च 1867 में बातचीत तेजी से आगे बढ़ी। रात भर चली चर्चा के बाद, सीवर्ड और स्टोकेल ने 30 मार्च को सुबह लगभग 4 बजे संधि पर हस्ताक्षर किए। तय की गई कीमत सोने के रूप में 7.2 मिलियन डॉलर थी। 586,412 वर्ग मील (लगभग 1.519 मिलियन वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्रफल के हिसाब से, यह कीमत लगभग 1.9 सेंट प्रति एकड़ बैठती है।

अमेरिकी सीनेट ने 9 अप्रैल को इस संधि को मंजूरी दी

अमेरिकी सीनेट ने 9 अप्रैल को इस संधि को मंजूरी दी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने 28 मई को इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया, और 20 जून को दोनों देशों ने इस समझौते की पुष्टि (रैटिफिकेशन) का आदान-प्रदान किया। 18 अक्टूबर 1867 को सिटका में अलास्का का औपचारिक रूप से हस्तांतरण कर दिया गया। इस सौदे ने उत्तरी अमेरिका के नक्शे को बदल दिया। फिर भी, जो लोग पीढ़ियों से अलास्का में रह रहे थे, उनसे इस फैसले के बारे में कोई राय नहीं ली गई।

जमीन के लेन-देन से कहीं बढ़कर साबित हुआ ये सौदा

यह सौदा केवल जमीन के लेन-देन से कहीं बढ़कर साबित हुआ। अलास्का एक आर्थिक संपत्ति और दो प्रतिस्पर्धी ताकतों के बीच एक रणनीतिक चौकी के रूप में उभर रहा था। फिर भी, 1867 के उस फैसले को केवल बाद की घटनाओं के आधार पर आंकना गलत होगा। रूस को यह अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि भविष्य में अलास्का में तेल की कितनी बड़ी संपदा मिलेगी, और न ही उसने यह सोचा होगा कि सैन्य तकनीक में होने वाले बदलाव आर्कटिक क्षेत्र को पूरी तरह बदल देंगे।

इस इलाके का बाद में जो भी मूल्य रहा हो, उससे यह साबित नहीं होता कि उस समय इसे बेचना कोई बेतुका फैसला था। रूस के सामने जो मजबूरियां थीं, उन्हें देखते हुए यह बिक्री समझदारी भरा कदम था, एक दूर की कॉलोनी, बढ़ता खर्च और बिना किसी मुआवजे के इसे किसी प्रतिद्वंद्वी के हाथों गंवा देने का खतरा।

अलास्का अमेरिका की सुरक्षा का एक अहम केंद्र बन गया

वहीं दूसरी ओर, अमेरिका को एक ऐसा इलाका मिल गया, जिसका आर्थिक और सैन्य महत्व आने वाले दशकों में और भी स्पष्ट होता गया। इस बिक्री से रूस और अमेरिका के बीच कोई नई प्रतिद्वंद्विता पैदा नहीं हुई, लेकिन इसने अमेरिकी क्षेत्र को रूस की सुदूर पूर्वी सीमा के ठीक सामने ला खड़ा किया, जिससे इस प्रतिद्वंद्विता को एक खास भौगोलिक रूप मिल गया।

इस नजदीकी के कारण, अलास्का अमेरिका की सुरक्षा और आर्कटिक अभियानों के लिए एक अहम केंद्र बन गया है। पेंटागन की 2024 की आर्कटिक रणनीति में इस क्षेत्र को अमेरिका के लिए एक 'उत्तरी प्रवेश द्वार' के रूप में बताया गया है। इसमें मिसाइल चेतावनी प्रणाली, निगरानी, संचार और सैन्य तैयारियों पर विशेष जोर दिया गया है।

अलास्का में मिसाइल-डिफेंस इंटरसेप्टर, रडार सिस्टम, लड़ाकू विमान और ऐसे सैन्य अड्डे मौजूद हैं, जो आर्कटिक और उत्तरी प्रशांत क्षेत्र में होने वाले अभियानों में मदद करते हैं।