वाशिंगटन, एएनआइ। शहरों में अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट- डब्ल्यूडब्ल्यूटीपी) से निकलने वाली दुर्गध लोगों के साथ ही वहां के पर्यावरण के लिए भी परेशानी खड़ी करती है। आसपास के लोगों के लिए सांस लेना तक कठिन हो जाता है। इस कारण दुर्गध प्रबंधन के लिए तरह-तरह के उपाय किए जाते हैं। अब विज्ञानियों ने इस समस्या के निदान का रास्ता तलाश लिया है। विज्ञानियों के मुताबिक, सेंसर लगे ड्रोन की इसमें अहम और सकारात्मक भूमिका हो सकती है। इस प्रयोग का निष्कर्ष 'रिमोट सेंसिंग' जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

इंस्टीट्यूट फार बायोइंजीनियरिंग आफ कैटालोनिया (आइबीईसी) और डीएमए नामक एक कंपनी ने दुर्गध की पहचान और उसके उपचार के उपायों के लिए हाथ मिलाया है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, स्निफड्रोन (पर्यावरण में सुधार के मकसद से दुर्गध पर निगरानी) नामक प्रोजेक्ट के बहुत सकारात्मक परिणाम आए हैं। इस नए सिस्टम की मदद से उचित कदम उठा कर संयंत्र के प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सकता है।

डीएएम के अनुसंधान विभाग के तकनीशियनों ने इसके लिए एक विशेष ड्रोन बनाया, जिसमें लगे केमिकल सेंसर दुर्गध की तीव्रता का पता लगाकर रीडिंग लेते हैं। इसकी मदद से दुर्गध के स्रोत का भी पता लगाया जा सकता है।

इस समय दुर्गध का आकलन करने के लिए जो तरीका अपनाया जाता है उसे इनफ्रीक्वेंट ओलफैक्टोमेट्रिक मेजरमेंट कहते हैं, जिसमें उसका सटीक आकलन नहीं हो पाता है। इस वजह से न तो उचित निगरानी हो पाती है और न ही संयंत्रों में उसका ठीक से उपचार।

यह करता है नया सिस्टम

शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके द्वारा विकसित सिस्टम दुर्गध धनत्व का पूरा खाका उपलब्ध कराता है, जिससे नियंत्रण के लिए उचित कदम उठाकर संयंत्र के प्रबंधन को मौजूदा से अधिक कारगर और बेहतर बनाया जा सकता है।

इस तरह काम करता है यह खास ड्रोन

इस विशेष ड्रोन में इलेक्ट्रानिक 21 केमिकल सेंसर लगे हैं, जो इलेक्ट्रानिक नोज (नाक) की तरह काम करते हैं। फिलहाल सेंसरों की यह संख्या अधिकतम है। इसके अलावा इसके मिनिएचर सेंसर चैंबर में तापमान, आ‌र्द्रता तथा दबाव सेंसर भी लगे हैं। साथ ही सैंपलिंग सिस्टम, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) से लैस है। इस कारण यह रियल टाइम में बेस स्टेशन के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से डाटा की प्रोसेसिंग और उसका विश्लेषण भी कर पाता है।

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