वाशिंगटन (प्रेट्र)। रोबोटिक्स के क्षेत्र में दुनियाभर में क्रांति की इबारत लिखी जा रही है। इसी कड़ी में वैज्ञानिक अब एक ऐसी प्रणाली विकसित करने में सफल हो गए हैं, जिससे मशीनें इंसानों की तरह सोच भी सकेंगी। दरअसल, वैज्ञानिकों ने एक नए तरीके की न्यूरल (तंत्रिका) नेटवर्क चिप विकसित कर ली है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसके इस्तेमाल से मशीनों की सोच काफी हद तक मानव जैसी हो सकेगी।

शब्दों का अनुमान लगाने में सक्षम 

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किए गए इस नेटवर्क को रेजरवेइर कंप्यूटिंग सिस्टम नाम दिया गया है। यह सिस्टम बातचीत के दौरान शब्दों को कहने से पहले ही उसका अनुमान लगा सकता है। यानी बातचीत के दौरान सामने वाले ने जो शब्द कहे हैं उसके आधार पर यह प्रणाली अनुमान लगा सकती है कि आगे कौन से शब्द का प्रयोग किया जाएगा। टिपिकल न्यूरल नेटवर्क की क्षमता को बढ़ाने और प्रशिक्षण समय को कम करने के लिए रेजरवेइर कंप्यूटिंग सिस्टम कुछ समय पहले बड़े ऑप्टिकल घटकों के साथ तैयार किया गया है।

यह है खासियत 

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के शोधकर्ताओं ने अपने इस सिस्टम को तैयार करने के लिए मेमरीस्टोर्स का प्रयोग किया, जो कम स्थान घेरता है और आसानी से सिलिकॉन आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स से एकीकृत हो जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मेमरीस्टोर्स एक विशेष प्रकार की डिवाइस है, जो लॉजिक और डाटा एकत्र करने के दोनों काम कर सकती है। इसके जरिए एक बार शब्दों का प्रयोग किए जाने पर यह उसमें सुरक्षित भी रहता है और उसे अपने अनुसार सही स्थान पर प्रयोग भी किया जा सकता है।

इस तरह इंसानों से समानता रखती है यह प्रणाली

नेचर कम्यूनिकेशंस नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने इसमें ऐसा मेमरीस्टोर्स प्रयोग किया है जो केवल हाल ही की घटनाओं को याद रखता है। यह मानव मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र और न्यूरॉन्स की कार्य प्रणाली से प्रेरित है। जिस तरह इंसानों को नवीन घटनाएं ज्यादा याद रहती हैं और पुरानी बातें धीरे-धीरे स्मृति से धूमिल होने लगती हैं उसी प्रकार यह इस प्रणाली में भी मशीनों को नवीन शब्द ज्यादा याद रहते हैं।

यह काम होगा आसान 

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के प्रोफेसर वी लू के मुताबिक, किसी नेटवर्क को प्रशिक्षित करने में कई दिन या कई महीने लग जाते हैं। यह बहुत ही खर्चीला काम है, लेकिन नई तकनीक बेहतर है। इसमें मशीन स्वयं ही सीखती चली जाती है। जिस प्रकाश मनुष्यों का मस्तिष्क धीरे-धीरे विकसित होता है उसी प्रकार इस प्रणाली के जरिए मशीन की सोचने की क्षमता भी विकसित होती है।

काफी हद तक मिली सफलता

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रणाली की जांच की गई तो इसकी सटीकता 91 फीसद पाई गई है। यह बेहद अच्छे संकेत हैं। इस दिशा में और प्रयोग किए जा रहे हैं। पूरी उम्मीद है कि जल्द ही यह प्रणाली मशीनों की दुनिया में क्रांतिकारी खोज साबित होगी।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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