वाशिंगटन, प्रेट्र। अफगानिस्तान में 18 साल से जारी खूनी संघर्ष को खत्म करने के लिए अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाला शांति समझौता खटाई में पड़ता दिख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया है क्योंकि प्रस्तावित समझौते के तहत अफगानिस्तान में अलकायदा को हराने के लिए अमेरिकी बलों के बने रहने या लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार की कोई गारंटी नहीं है। इसमें अफगानिस्तान में युद्ध खत्म होने की भी गारंटी नहीं है। अमेरिकी मैगजीन टाइम ने यह दावा किया है।

टाइम में बुधवार को प्रकाशित खबर के अनुसार, पोंपियो ने तालिबान के साथ शांति समझौते में अपना नाम शामिल किए जाने से मना कर दिया है। अमेरिका के विशेष दूत जालमे खलीलजाद और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच नौ दौर की बातचीत के बाद शांति समझौते के मसौदे पर मुहर लगी है।

ईमानदारी का कोई प्रमाण नहीं
दोनों पक्षों में गत दिसंबर से कतर की राजधानी दोहा में वार्ता चल रही थी। टाइम ने अफगानिस्तान, ट्रंप प्रशासन और यूरोपीय यूनियन के वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से यह खबर दी है। खलीलजाद के साथ समझौते के बारे में जानकारी देने वाले एक अफगान अधिकारी ने कहा, 'कोई भी पूरे यकीन के साथ कुछ नहीं कह रहा है क्योंकि तालिबान पर विश्वास करने और उसकी ईमानदारी का कोई प्रमाण नहीं है।' मैगजीन के अनुसार, तालिबान ने कहा है कि समझौते पर पोंपियो हस्ताक्षर करें।

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इस वजह से किया मना
अफगान अधिकारियों ने कहा, 'इस तरह के दस्तावेज पर अमेरिकी विदेश मंत्री के हस्ताक्षर होने से तालिबान को वैध राजनीतिक संगठन के तौर पर मान्यता मिल जाएगी। इसलिए उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया है।' इस खबर पर पोंपियो के कार्यालय ने कुछ भी कहने से मना कर दिया है।

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Posted By: Dhyanendra Singh

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