नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। वन बेल्ट,वन रोड के जरिए चीन अपनी पहुंच पूरब से लेकर पश्चिम तक बढ़ाना चाहता है। दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीति किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में अपनी दखल को बढ़ाकर दबाव बनाने की कोशिश में है। इन सबके बीच अमेरिका रक्षा मंत्रालय के हेडक्वॉर्टर पेंटागन ने जो रिपोर्ट जारी की है वो परेशानी बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। पेंटागन का स्पष्ट मानना है कि विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाने के लिए चीन अनैतिक तरीके से आगे बढ़ रहा है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन एक अलग तरह की व्यवस्था का निर्माण कर रहा है जिसपर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। चीन और रूस को लेकर पेंटागन की सोच को जानने और समझने के साथ ही भारत के लिए इसके मायने हैं समझने की कोशिश करेंगे। 

पेंटागन रिपोर्ट और चीन

पेंटागन का कहना है कि चीन अब रणनीतिक प्रतिस्पर्धी बन चुका है जो अपने शिकारी अर्थशास्त्र के जरिए पड़ोसियों को धमका कर अपने सीमा को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। चीन और रूस ने अमेरिका के तकनीकी लाभों को कम कर दिया है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन लगातार बलपूर्वक अपने पड़ोसी देशों को धमका रहा है। एक अक्टूबर को शूरू होने वाले वित्तीय वर्ष 2019 के बजट प्रस्तावों से पहले पेंटागन ने अमेरिकी कांग्रेस को जानकारी दी। ट्रंप प्रशासन ने वित्तीय वर्ष 2019 के लिए बजट प्रस्तावों को रिलीज किया। वित्तीय वर्ष, कैलेंडर ईयर से अलग होता है। अमेरिका में वित्तीय वर्ष की शुरुआत अक्टूबर से लेकर सितंबर तक होती है।  पेंटागन का कहना है कि चीन अपने आर्थिक सैन्य तैयारियों के जरिए अपनी शक्ति को विस्तार देने में जुटा हुआ है। चीन एक तरफ भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र में सैन्य आधुनिकीकरण के जरिए क्षेत्रीय स्तर पर दादागीरी पर उतर चुका है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका के प्रभाव को किसी भी तरीके से बढ़ने से रोकना ही चीन का एकमात्र लक्ष्य है।

जानकार की राय

दैनिक जागरण से खास बातचीत में प्रोफेसर हर्ष वी पंत ने कहा कि पेंटागन की ये रिपोर्ट अमेरिकी चिंता को जाहिर करती है। लेकिन वन बेल्ट, वन रोड और दक्षिण चीन सागर में जिस ढंग से चीन दखल दे रहा है वो भारत के लिए भी चिंता का विषय है। श्रीलंका और बांग्लादेश में चीन ने बड़े पैमाने पर निवेश के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की है। नेपाल में भी इंटरनेट कनेक्टिविटी के जरिए चीन दखल बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत को आक्रामक अंदाज में अपनी बात रखनी होगी। अमेरिका और भारत के रिश्तों में ऊंचाई आई है जिसे और आगे ले जाने की जरूरत है। जिस तरह से उत्तर कोरिया और ईरान अमेरिका की अनदेखी कर रहे हैं उस हालात में अमेरिका को एक बेहत सामरिक साझेदार की जरूरत है जिसमें भारत बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।  

चीन -रूस का नापाक गठजोड़

अब ये साफ तौर पर देखने में नजर आ रहा है कि चीन और रूस आपस में गठजोड़ कर निरंकुश तरीके से दुनिया को संचालित करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरे देशों की आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधों को जिस अंदाज में चीन वीटो लगा रहा है निरंकुश सत्ता की तरफ इशारा करते हैं। चीन जैसे अपने पड़ोसियों के मुद्दे पर वीटो का इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहा है वैसे ही रूस भी अरने पड़ोसियों के साथ उसी तरह का व्यवहार कर रहा है। इसे आप नेटो और मध्य पूर्व के देशों में हस्तक्षेप के तौर पर देख सकते हैं।

 अमेरिका को परेशान करने की कोशिश 

नई तकनीक और प्रजातांत्रिक मूल्यों को जिस तरह से जॉर्जिया, क्रीमिया और पूर्वी यूक्रेन में किया गया वो सब इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि आने वाले समय में दुनिया में एक अलग तरह का समीकरण बनेगा जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। उत्तर कोरिया और ईरान जैसे शत्रु देश अपने अपने इलाकों को अशांति की तरफ ले जा रहे हैं। ये देश न केवल परमाणु हथियारों का जखीरा इकठ्ठा कर रहे हैं बल्कि आतंकवाद के भी प्रायोजक देश हैं। उत्तर कोरिया, परमाणु के साथ साथ जैविक, रासायानिक और परंपरागत हथियारों के बल पर दक्षिण कोरिया, जापान और यूएस पर बेजा दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। 

By Lalit Rai