वाशिंगटन, प्रेट्र। गंभीर रूप से बीमार भारतीय हथिनी अंबिका को अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन के चिड़ि‍याघर में बीते शुक्रवार को दवा के जरिये इच्छामृत्यु दे दी गई। 72 साल की अंबिका खड़े हो पाने में असमर्थ थी। 1961 में अंबिका को भारतीय बच्चों की तरफ से अमेरिका को उपहार स्वरूप दिया गया था। तब से वह वाशिंगटन के स्मिथसोनियन नेशनल जू में रह रही थी। अंबिका को उत्तरी अमेरिकी में तीसरा सबसे पुराना एशियाई हाथी माना जाता था, जिसमें ज्यादातर मादाएं केवल 40 वर्ष की होती हैं।

अमेरिकी चिड़ि‍याघर के कर्मचारियों ने गहरा दुख व्यक्त किया

अमेरिका की सबसे बुजुर्ग एशियाई हथिनी होने के कारण वैज्ञानिक उस पर कई प्रकार के अध्ययन कर रहे थे। पिछले एक दशक से गठिया से जूझ रही इस हथिनी का इलाज चल रहा था। सबकी चहेती बन चुकी इस हथिनी की मौत पर अमेरिकी चिड़ि‍याघर के कर्मचारियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। अमेरिका में भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू ने भी अंबिका को श्रद्धांजलि दी। 1948 में जन्मी इस हथिनी को आठ साल की उम्र में कुर्ग के जंगल में पकड़ा गया था। पिछले कुछ दिनों से उसकी अत्यंत दयनीय हालत को देखते हुए पशुचिकित्सकों ने दवा के जरिये उसे इच्छामृत्यु देना ही ठीक समझा।

संरक्षण और अनुसंधान में थी अंबिका की प्रमुख भूमिका 

स्मिथसोनियन नेशनल जू एंड कंजर्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट में जॉन और एड्रिएन मार्स निदेशक स्टीवन मोनफोर्ट ने एक बयान में कहा कि अंबिका वास्तव में हमारे संरक्षित समुदाय में  एक विशालकाय थी। पिछले पांच दशकों से अंबिका एक राजदूत के रूप में और अपनी प्रजाति के लिए अग्रणी के रूप में सेवा करती है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वैज्ञानिक एशियाई हाथियों के बारे में जीव विज्ञान, व्यवहार, प्रजनन और पारिस्थितिकी के बारे में जितना जानते हैं, वह हमारे संरक्षण और अनुसंधान अध्ययनों में अंबिका की भागीदारी के लिए धन्यवाद अदा करते हैं। 

अंबिका को था ऑस्टियोआर्थराइटिस

चिड़ि‍याघर के कर्मचारियों ने बताया कि अंबिका को ऑस्टियोआर्थराइटिस था जो उसने अपने 60 के दशक के अंत में विकसित हुआ था। चिड़ियाघर के अनुसार, उसके रोग की प्रगति को धीमा करने के लिए दर्द का इलाज किया जा रहा था। उसने कहा कि उसके पैरों और नाखूनों पर घाव थे, जिनका इलाज नियमित तौर पर पैर का स्नान, पेडीक्योर, सामयिक और मौखिक दवाओं और एंटीबायोटिक दवाओं के साथ किया जा रहा था। लेकिन पिछले हफ्ते से वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रही थी। काफी इलाज करने के बाद भी उसका रोग ठीक नहीं किया जा सका।   

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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