अमेरिका में H-1B वीजा एक्सटेंशन कराने पर लगेगी भारी फीस, भारतीयों पर होगा सबसे ज्यादा असर
ट्रंप प्रशासन H-1B और L-1 वीजा एक्सटेंशन को महंगा करने की योजना बना रहा है, जिससे विदेशी कुशल कर्मचारियों, खासकर भारतीय पेशेवरों पर असर पड़ेगा।

एच-1बी वीजा को बढ़ाने के लिए फीस महंगी करेगा ट्रंप प्रशासन।
HighLights
ट्रंप प्रशासन H-1B, L-1 वीजा एक्सटेंशन महंगा करेगा।
भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों पर सीधा असर।
नवीनीकरण पर 9-11 रिस्पॉन्स, बायोमेट्रिक फीस लगेगी।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप प्रशासन H-1B और L-1 वीजा की अवधि बढ़ाने को और महंगा करने की योजना बना रहा है। इस कदम से उन बड़ी अमेरिकी कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है जो विदेशी कुशल कर्मचारियों (जिनमें हजारों भारतीय पेशेवर भी शामिल हैं) पर निर्भर हैं।
होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के रेगुलेटरी एजेंडा के अनुसार, एक आखिरी नियम आने की उम्मीद है, जिसके तहत वर्क वीजा बढ़ाने की याचिकाओं पर भी 9-11 रिस्पॉन्स और बायोमेट्रिक एंट्री-एक्जिट फीस लागू की जाएगी।
क्या कहता है मौजूदा नियम?
अमेरिका में मौजूदा नियमों के तहत जिन कंपनियों में 50 से ज्यादा कर्मचारी हैं और उनमें से आधे से ज्यादा के पास H-1B या L-1 वीजा है तो उन्हें शुरुआती याचिका दाखिल करते समय या किसी कर्मचारी के नियोक्ता बदलने पर H-1B याचिकाओं के लिए अतिरिक्त 4,000 डॉलर और L-1 याचिकाओं के लिए 4,500 डॉलर का भुगतान करना पड़ता है।
नियम में कहा गया है, "डीएचएस नियमों में बदलाव और स्पष्टीकरण कर रहा है ताकि यह साफ किया जा सके कि 9-11 रिस्पॉन्स फीस सभी H-1B और L-1 एक्सटेंशन याचिकाओं पर लागू होगी।"
गूगल और मेटा पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
यह नया प्रस्ताव ट्रंप प्रशासन को हाल ही में मिली एक कानूनी हार के बाद आया है। अमेरिकी फैडरल अपील्स कोर्ट ने नए H-1B वीजा पर प्रस्तावित 1,00,000 डॉलर की फीस को रद करने वाले निचली अदालत के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
आमतौर पर H-1B वीजा वाले कर्मचारियों को शुरुआती तीन साल के प्रवास के बाद वीजा बढ़वाने की जरूरत होती है। इसलिए प्रस्तावित बदलावों से उन कंपनियों के लिए इमिग्रेशन से जुड़े खर्च बढ़ सकते हैं जो विदेशी टैलेंट (जिसमें भारतीय पेशेवर भी शामिल हैं) पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।
इस प्रस्ताव का असर गूगल और मेटा जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों पर भी पड़ेगा, जो अपने यूएस ऑपरेशन्स में एग्जीक्यूटिव, मैनेजर और खास जानकारी रखने वाले कर्मचारियों को भेजने के लिए L-1 वीजा का इस्तेमाल करती हैं।
भारतीय कर्मचारियों पर भी असर
इस कदम से अमेरिका में काम कर रहे भारतीय प्रोफेशनल्स पर असर पड़ने की संभावना है, क्योंकि हर साल मिलने वाले ज्यादातर H-1B एक्सटेंशन इन्हीं को मिलते हैं। यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के डेटा के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में कुल 406,685 H-1B याचिकाओं को मंजूरी दी गई।
इनमें से 71 प्रतिशत मंजूरियां (जो कुल 291,542 अर्जियों के बराबर हैं) प्रोग्राम में पहली बार शामिल होने वालों के बजाय पहले से चल रहे रोजगार को जारी रखने के लिए थीं। इन मंजूरियों में से 226,359 भारतीय नागरिकों को मिलीं, जो सभी H-1B रिन्यूअल का 77.6 प्रतिशत है। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जिसे 31,581 मंजूरियां मिलीं।
बड़ी टेक कंपनियां होंगी प्रभावित
प्रस्तावित फीस बढ़ोतरी का असर खास तौर पर बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों और आईटी सर्विस फर्मों पर पड़ सकता है, जो H-1B कर्मचारियों पर निर्भर हैं। नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी के डेटा से पता चलता है कि वित्तीय वर्ष 2025 में नौकरी जारी रखने के लिए मंजूर हुई H-1B याचिकाओं में सबसे ज्यादा याचिकाएं अमेजन को मिलीं (14,532)। इसके बाद टीसीएस (5,293), माइक्रोसॉफ्ट (4,863), मेटा (4,740), एप्पल (4,610) और गूगल (4,509) का नंबर आता है।
