संयुक्त राष्ट्र, पीटीआइ। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि असम में NRC को अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दे के साथ गलत तरीके से जोड़ा जा रहा है। साथ ही कहा कि अधूरी जानकारी के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पॉलोमी त्रिपाठी ने कहा कि नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्ट्रार (एनआरसी) को अपडेट करना एक सांविधिक, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया है जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी की जाती है। एनआरसी का मुद्दा भारत में असम राज्य में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा नहीं है।

त्रिपाठी ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति (सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक) के एक सत्र में कहा कि हम निराश हैं कि यह मुद्दा अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दे के साथ गलत तरीके से जुड़ा हुआ है। भारत में अल्पसंख्यक संवैधानिक सुरक्षा अधिकारो का पूरा इस्तेमाल करते है। त्रिपाठी ने अल्पसंख्यक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत फर्नांड डी वर्नेज़ द्वारा की गई टिप्पणियों का जवाब देने के लिए मंच का उपयोग किया। 

फर्नांड ने एनआरसी मुद्दे पर कहा था कि  यह संभावित मानवीय संकट में योगदान दे सकता है।   हजारों की संख्या में जोखिम के कारण अस्थिर स्थिति और शायद लाखों लोग जो मुख्य रूप से भारत में बंगाली और मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, उन्हें असम राज्य में विदेशी और संभावित गैर-नागरिक माना जा रहा है। अपनी प्रतिक्रिया में, त्रिपाठी ने कहा कि NRC से बाहर करने से असम के किसी भी निवासी के अधिकारों का हनन नहीं किया गया है।

जिनका नाम अंतिम सूची में नहीं हैं, उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया है। यह उन्हें एक बहिष्कृत या विदेशी नहीं बनाता है। उन्होंने कहा कि अधूरी समझ पर आधारित गलत निष्कर्षों में कूदने के बजाय न्यायिक प्रक्रियाओं को पूरा करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

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