वाशिंगटन [न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स]। बात अगर डिजिटल प्राइवेसी की हो तो एक बात तय है कि कभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है। एक ओर बड़ी टेक कंपनियां डाटा की हिफाजत में लगी हैं, तो दूसरी ओर सैकड़ों कंपनियां इसमें सेंध लगाने की कोशिश में जुटी हैं। दोनों पक्षों के बीच ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ का खेल चलता रहता है। डाटा में सेंध लगाने की एक नई कोशिश का नाम है ‘फिंगरप्रिंटिंग’। डाटा के जरिये कंपनियां यह पता कर सकती हैं कि लोग एप का कैसे इस्तेमाल करते हैं।

यूजर की गतिविधियों को पहचानने के लिए ‘फिंगरप्रिंटिंग’ का इस्‍तेमाल
कुछ कंपनियां यूजर के फोन और कंप्यूटर सिस्टम का फिंगरप्रिंट तैयार करके यूजर की गतिविधियों को पहचानती हैं। जैसे किसी इंसान के फिंगरप्रिंट यानी अंगुलियों के निशान से उसकी पहचान आसानी से हो सकती है। ऐसे ही यह डिजिटल फिंगरप्रिंट भी किसी यूजर की पहचान बताने में सक्षम होता है। इसकी मदद से कुछ एप और वेबसाइट यूजर की गतिविधियों को ट्रैक करती हैं और उसके हिसाब से विज्ञापन देती हैं। इस डिजिटल फिंगरप्रिंट को अन्य कंपनियों को भी बेचा जा सकता है। फिलहाल यह बहुत खतरनाक तो नहीं है, लेकिन चिंता की बात जरूर है।

निजता पर सख्त हैं बड़ी कंपनियां
पिछले कुछ वर्षों के दौरान एपल और मोजिला जैसी बड़ी टेक कंपनियों ने यूजर्स की निजता की दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। इनके वेब ब्राउजर में ट्रैकिंग को रोकने की सुविधा दी गई है। इन कदमों के चलते विज्ञापन कंपनियों के लिए वेब से जुड़ी हमारी गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल होता जा रहा है। इस सख्ती ने ही अब इन कंपनियों को दूसरा रास्ता अपनाने को प्रेरित किया है। इसी दूसरे रास्ते का नाम है ‘फिंगरप्रिंटिंग’।

मजबूरी है कुछ डाटा देना
आप जब भी कोई वेबसाइट खोलते हैं, तो वह आपके कंप्यूटर या फोन के बारे में कुछ जानकारियां लेती है। इसमें आपके ऑपरेटिंग सिस्टम की जानकारी और अन्य कॉन्फिगरेशन से जुड़े डाटा शामिल रहते हैं। वेबसाइट को सुचारू ढंग से चलने के लिए इन डाटा की जरूरत पड़ती है। इसी तरह फोन पर पहली बार कोई एप चलाने के लिए भी उसे कुछ जानकारियों की जरूरत पड़ती है। इनमें आपके एंड्रॉयड का वर्जन और हार्डवेयर से संबंधित अन्य जानकारियां शामिल रहती हैं।

कैसे काम करती है फिंगरप्रिंटिंग...?
फिंगरप्रिंटिंग इसी मजबूरी में अपने लिए जगह तलाशती है। वह उन्हीं डाटा को इकट्ठा करती है जो किसी एप या वेबसाइट के सही से काम करने के लिए जरूरी होते हैं। इसमें आपके सिस्टम के स्क्रीन रेजोल्यूशन, ऑपरेटिंग सिस्टम और मॉडल से जुड़ा डाटा लिया जाता है। इसी डाटा की मदद से कंपनियां इस बात पर निगाह रखती हैं कि आप वेब और एप का कैसे इस्तेमाल करते हैं। लंबे समय तक अगर किसी यूजर के फोन से इस तरह का डाटा जुटाया जाए, तो वह यूजर की आदतों और गतिविधियों के बारे में बहुत कुछ बताता है। इन डाटा को जुटाकर कंपनियां यूजर का एक पूरा प्रोफाइल बना लेती हैं, जिससे यूजर की पहचान तैयार हो जाती है। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इस प्रोफाइल को यूजर की पहचान के मामले में 99 फीसद तक कारगर पाया है।

Posted By: Krishna Bihari Singh

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