बोस्टन (प्रेट्र)। ज्वालामुखी की राख का प्रयोग कंक्रीट के मिश्रण में किया जा सकता है। यह जानकारी एक अध्ययन में सामने आई है। इससे इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में होने वाली लागत को कम किया जा सकता है। अमेरिका में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) के रिसर्चरों ने पता लगाया है कि कुछ मात्रा में सीमेंट के स्थान पर ज्वालामुखी की राख का प्रयोग करके कंक्रीट के निर्माण में खर्च होने वाली कुल ऊर्जा को कम किया जा सकता है।

उनकी गणना के मुताबिक पचास प्रतिशत ज्वालामुखी राख के प्रयोग से कंक्रीट के 26 भवन बनाने पर खर्च होने वाली ऊर्जा इतने ही भवनों को सिर्फ सीमेंट से बनाने पर खर्च होने वाली ऊर्जा से 16 प्रतिशत कम होगी। रिसर्चरों ने यह भी पता लगाया कि इस राख का बारीक पाउडर सीमेंट के साथ मिलाने पर कंक्रीट से जो स्ट्रक्चर बनते हैं वे सिर्फ सीमेंट से बनने वाले स्ट्रक्चरों की तुलना में बहुत मजबूत होते हैं।

पूरी दुनिया में भवन निर्माण सामग्री के रूप में कंक्रीट का व्यापक उपयोग होता है। कंक्रीट के निर्माण की प्रक्रिया लंबी-चौड़ी होती है। पहले खदानों से चूना पत्थर निकाला जाता है। फिर उसे मिलों तक पहुंचाया जाता है, जहां उसे पीस कर उच्च तापमान पर विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। इस तरह सीमेंट निर्मित करने पर बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है और इसका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

दुनिया में कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में करीब पांच प्रतिशत हिस्सा पारंपरिक सीमेंट के उत्पादन से आता है। सीमेंट में दूसरी चीजें मिला कर या सीमेंट के वैकल्पिक पदार्थों का उपयोग बढ़ा कर इन उत्सर्जनों को काफी कम किया जा सकता है।

रिसर्चरों का कहना है कि कंक्रीट के निर्माण में मसाले के रूप में ज्वालमुखी की राख के प्रयोग के कई पर्यावरणीय लाभ हैं। यह चट्टानी पदार्थ दुनिया में सक्रिय या निष्क्रिय ज्वालामुखियों के इर्द-गिर्द बहुतायत में कुदरती रूप से उपलब्ध है।

इसको आम तौर पर अपशिष्ट पदार्थ माना जाता है और लोग इसका प्रयोग नहीं करते। कुछ किस्म की ज्वालामुखीय राख में पोजोलोनिक गुण होता है। इस गुण का यह अर्थ हुआ कि इस राख का पाउडर और सीमेंट का कुछ हिस्सा पानी और अन्य पदार्थों से चिपक कर एक सीमेंट जैसा पेस्ट बना देता है।  

Posted By: Sanjay Pokhriyal