वाशिंगटन [प्रेट्र]। बच्चे अगर छोटी उम्र में अत्यधिक आत्मनियंत्रण दिखाएं या उनमें हर काम को पूरे परफेक्शन से करने की प्रवृत्ति दिखाई दे तो थोड़ा सावधान हो जाइए। एक नए अध्ययन का दावा है कि ऐसे बच्चों में आगे चलकर अन्य की तुलना में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर यानी ओएसडी का शिकार होने की आशंका दो गुना बढ़ जाती है। यह अध्ययन जर्नल जेएएमए साइकिएट्री में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के मुताबिक परफेक्शनिस्टों (ऐसे लोग हर चीज को पूरी तरह त्रुटिहीन तरीके से करना चाहते हैं) के मस्तिष्क की संरचना छोटी होती है और यह वह अवस्था है जिसे काफी पहले ओएसडी से जोड़ा जा चुका है।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता किर्सटेन ए. गिलबर्ट ने कहा कि अक्सर हम देखते हैं कि माता-पिता बच्चों के अपना काम एकदम सही तरीके से करने और खुद पर पूर्ण नियंत्रण रखने को बहुत अच्छा मानते हैं, लेकिन हद से अधिक आत्मनियंत्रण और चीजों को परफेक्ट तरीके से करने की चाहत उनमें मानसिक बीमारी का संकेत हो सकती है। ओएसडी के साथ ही ये लक्षण कुछ अन्य डिसआर्डर का भी संकेत होते हैं, जैसे एनर्सिया और सामाजिक बेचैनी। ओएसडी एक गंभीर मानसिक बीमारी है। इसमें किसी व्यक्ति का अपनी सोच पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है, उसे एक ही विचार बार-बार आते हैं या फिर वह किसी चीज को लेकर हद से अधिक आग्रही हो सकता है।

इससे पीड़ित व्यक्ति के व्यवहार में भी खासा फर्क आ जाता है और वह एक ही चीज को बार-बार करने लगता है, जैसे थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ धोना या फिर उसे बार-बार यह चेक करने की जरूरत महसूस होती है कि दरवाजे को सही तरह लाक कर दिया है या नहीं? यह जरूरी होता है कि इस तरह के डिसआर्डर को जितना जल्दी हो सके पहचान लिया जाए, क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो व्यवहार में आने वाला यह अंतर आगे चलकर गंभीर

मानसिक बीमारी का कारण बन सकता है। खासकर बच्चों के मामले में अगर इसे समय रहते पहचान लिया जाए तो उन्हें व्यवहार संबंधी डिसआर्डर से बचाया जा सकता है या फिर किसी चीज के प्रति उनके आग्रह को कम किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने चार से पांच साल तक के 292 बच्चों का परीक्षण किया। इनमें से 35 बच्चे अगले 12 सालों में ओएसडी के शिकार हो गए। ये वे बच्चे थे जो छोटी उम्र में या तो अपने काम में परफेक्शन को लेकर जरूरत से ज्यादा जोर देते थे या फिर उनमें अत्यधिक आत्मनियंत्रण था।

शोधार्थियों ने इस तरह किया अध्ययन
प्रयोगकर्ताओं ने बच्चे को एक खाली शीट और ग्रीन मार्क दिया और कहा कि मेरे लिए इस शीट पर एक परफेक्ट ग्रीन सर्किल बना दो। जब बच्चे ने सर्किल बनाकर प्रयोगकर्ता को सौंपा तो उसे जानबूझकर नकारात्मक फीडबैक दिया गया। कभी कहा गया कि यह कुछ ज्यादा ही फ्लैट है और कभी कहा गया कि यह काफी छोटा है। इस तरह बच्चे से फिर सर्किल बनाने के लिए कहा गया।

निगेटिव फीड बैक के करीब साढ़े तीन मिनट बाद बच्चे के समक्ष प्रयोगकर्ता ने स्वीकार किया कि उसने कुछ ज्यादा ही सख्त रवैया अपनाया। इसके साथ ही बच्चे की तारीफ करते हुए उससे कहा गया कि उसने सब कुछ सही तरह किया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान शोधकर्ताओं ने बच्चे के व्यवहार के वीडियो का विश्लेषण किया कि वे किस तरह परफेक्शन की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने बच्चे के अपने प्रदर्शन की तीव्रता की रेटिंग भी की। गिलबर्ट ने बताया कि कुछ बच्चों में आत्म आलोचना की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही थी। शोधकर्ताओं ने उनके काम में कमियां जरूर बताईं, लेकिन वे अपने काम से संतुष्ट ही नहीं हो रहे थे। गिलबर्ट के मुताबिक ऐसे ही बच्चों में आगे चलकर ओएसडी का शिकार होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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