नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। 100 साल पहले प्रथम विश्व युद्ध में इस्तेमाल किया गया बमवर्षक विमान Airco DH9 बीकानेर के एक राजा के महल में खस्ता हालत में पड़ा था। ये विमान महल में उस जगह पर रखा हुआ था जहां पर हाथियों को बांधा जाता था। अब से दो दशक पहले इंग्लैंड से एक प्रेमी युगल भारत घूमने के लिए आया, उस दौरान वो बीकानेर के इस महल को भी देखने के लिए गए। इसी दौरान उन्होंने हाथियों को बांधे जाने की जगह पर इस विमान के अवशेष देखे। तब उन्होंने अपने मन में इस विमान को नया जीवन देने की ठानी। इसके लिए महाराजा से बात की गई, वो इस दंपत्ति को ये विमान देने के लिए राजी हो गए। इंग्लैंड से आए जोड़े ने इस विमान के अवशेषों को बारी-बारी से इंग्लैंड पहुंचाया, उसके बाद इसके नए सिरे से निर्माण का काम शुरू हुआ।

20 साल की लंबी मेहनत के बाद ये विमान नए सिरे से बनकर तैयार हो गया, अब इस पुराने विमान में आज के दशक की आधुनिक चीजें लगी थीं। उसके बाद इसको उड़ाने की दिशा में मेहनत शुरु हुई। इस पुराने विमान को उड़ाने के लिए भी पुराने समय के पायलट की जरूरत थी। तब उस समय के कुछ पायलेटों की खोज की गई जो उस समय किसी तरह का विमान चलाते रहे हो क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद से विमानों की तकनीक में काफी बदलाव हो गया, अब उस तकनीक के विमान न तो बन रहे ना ही कोई उपयोग कर रहा है। इस वजह से नए पायलेटों का इन विमानों को उड़ा पाना भी आसान नहीं था। डॉज बेली नामक एक सेवानिवृत्त प्रदर्शन पायलट ने विमान को उड़ाने के लिए स्वेच्छा से उड़ान भरी और 30 मिनट तक उड़ा। इस विमान पर पहले शोध किया गया उसके बाद उसको उसी रंग में रंगकर आसमान में उड़ने लायक बनाया गया।

कैसे दंपत्ति को मिला विमान

राजस्थान के बीकानेर में एक महाराजा के महल में घूमने के लिए 62 वर्षीय जेनिस ब्लैक और उनके पति 70 वर्षीय गाइ जेनिस गए थे। उस दौरान उनको महल के एक हिस्से में उनको इसके अवशेष दिखे, इसको परो पर दीमक लग गए थे और इंजन बुरी तरह से खराब हो गया था। इस ऐतिहासिक विमान को देखने के बाद दंपत्ति ने इसको ले जाकर पुनः इसको उसी रूप में लाने का मन बनाया, उसके बाद इस दिशा में काम शुरू किया गया। विमान को उसी रूप में लाने के लिए उस कंपनी की तलाश की गई जिसने उसे बनाया था। रिट्रोटेक नामक कंपनी के संस्थापक हैं, जो ऐतिहासिक विमानों को पुनर्स्थापित करता है उस कंपनी से संपर्क करने के बाद उसके इंजीनियरों से इस विमान को उसी रूप में लौटाने के लिए कहा गया, तब उन्होंने इस पर काम शुरू किया। इंजीनियरों की 20 साल की मेहनत के बाद ये विमान एक बार फिर आसमान पर पहुंच गया।

उसी रूप में विमान को लाने की कोशिशें हुई तेज

जब विमान के अवशेष इग्लैंड पहुंच गए उसके बाद उसको पुराने रूप में लाने के लिए काम शुरू किया गया। कुछ पुरानी तस्वीरें निकाली गई उसके बाद उसके पंख, रंग और इंजन को रूप देने का काम शुरू किया गया। शिल्पकारों ने उसी हिसाब से इसके पंख बनाए फिर उनको रंगा गया। डीएच 9 एस का निर्माण 1917 में वॉरमिंग एंड गिलो के हैमरस्मिथ कारखाने में किया गया था। प्लाईवुड क्लैडिंग ने 230lb या चार 112lb बमों की एक जोड़ी के लिए भंडारण के साथ धड़ को कवर किया, जिसे फ्लैप के माध्यम से गिरा दिया गया था

बन जाने के बाद शुरू हुई जांच

जब ये विमान पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया उसके बाद इंजीनियर्स ने इसकी जांच की। उसमें जो भी कमियां मिली, उनको दूर करने के लिए काम शुरू किया गया। सारे काम पूरे हो जाने के बाद फिर से इसका निरीक्षण किया गया। इंजीनियरों की तरफ से ग्रीन सिग्नल मिल जाने के बाद फिर से उसकी जांच की गई उसके बाद ये विमान उड़ान भर पाया।  

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Posted By: Vinay Tiwari