'9/11 हमले के 25 साल बाद अफगानिस्तान में फिर शुरू हुए अल-कायदा और आतंकी कैंप', अमेरिका का दावा
अमेरिका ने दावा किया है कि 9/11 के 25 साल बाद अफगानिस्तान में अल-कायदा और आतंकी ट्रेनिंग कैंप फिर से सक्रिय हो गए हैं।

अफगानिस्तान में फिर सक्रिय हुए आतंकी कैंप। (फाइल फोटो।)
HighLights
अमेरिका का दावा: अफगानिस्तान में अल-कायदा कैंप फिर शुरू।
तालिबान वापसी के बाद सुरक्षा खालीपन का फायदा।
आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग, भारत के लिए चिंता।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिका ने दावा किया है कि 9/11 के 25 साल बाद अफगानिस्तान में अल-कायदा और आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप फिर से शुरू हो गए हैं।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के सत्ता में लौटने और 2021 में अमेरिका के हटने से पैदा हुए सुरक्षा के खालीपन का फायदा उठाकर, इस आतंकवादी संगठन और उससे जुड़े समूहों ने पिछले तीन सालों में अफगानिस्तान में कम से कम आठ ट्रेनिंग सेंटर बनाए हैं।
कैंपों में मिल रही आधुनिक ट्रेनिंग
यूएन के मॉनिटर और पश्चिमी देशों के इंटेलिजेंस अधिकारियों का कहना है कि इन कैंपों का इस्तेमाल हथियारों, विस्फोटकों, गुरिल्ला युद्ध और एन्क्रिप्शन, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग के लिए किया जा रहा है।
अब मुख्य अल-कायदा में शायद 100 लड़ाके ही बचे हैं और यह एक हमलावर सेना के बजाय दूसरे उग्रवादी समूहों के लिए सलाहकार सेवा के तौर पर काम कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरे आतंकी समूहों ने भी नए ट्रेनिंग सेंटर बनाए हैं। इससे उग्रवादी इस्लामी समूहों को अफगानिस्तान के 34 में से कम से कम 14 प्रांतों में पैर जमाने का मौका मिला है।
भारत के लिए चिंता का विषय
अल-कायदा के फिर से सक्रिय होने के बारे में भारत के लिए चेतावनी का सबसे चिंताजनक पहलू यह नहीं है कि यह आतंकी संगठन ट्रेनिंग कैंप फिर से बना रहा है बल्कि यह है कि उन कैंपों के आस-पास का भूगोल, नेटवर्क और क्षेत्रीय माहौल बहुत हद तक जाने-पहचाने लगते हैं।
1990 और 2000 के दशक में भारत ने आतंकवादी हिंसा का सामना किया, जबकि अमेरिकी जनता तब तक अंतरराष्ट्रीय जिहादी खतरे के बारे में जागरूक होना शुरू ही हुई थी। इसलिए, यह कोई नया अध्याय नहीं बल्कि नई तकनीक के साथ एक पुरानी चेतावनी है, क्योंकि अल-कायदा की कहानी पाकिस्तान से गहराई से जुड़ी हुई है।
कमीशन ने दिया ब्योरा
9/11 कमीशन ने इस बात का ब्योरा दिया है कि कैसे 1993 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए बम धमाकों के मास्टरमाइंड रमजी यूसुफ की मुलाकात पाकिस्तान में खालिद शेख मोहम्मद से हुई और आखिरकार 1995 में उसे इस्लामाबाद में पकड़ लिया गया।
केएसएम एक पाकिस्तान का नागरिक था लेकिन कुवैत में पैदा होने की वजह से उसे गलती से कुवैती समझा जाता था। अफगानिस्तान जाने से पहले पाकिस्तान में ही रहता था। वहीं उसकी मुलाकात ओसामा बिन लादेन से हुई और उसने वह आइडिया पेश किया जो बाद में 9/11 ऑपरेशन बना। वह ग्वांतानामो में कैद है। अल-कायदा के दूसरे बड़े नेताओं का भी यही हाल हुआ।
अबू जुबैदा को 2002 में पाकिस्तान में पकड़ा गया था और उसी समय रमजी बिन अल-शिभ को भी। केएसएम को अगले साल रावलपिंडी में पकड़ा गया और खुद बिन लादेन आखिरकार अफगानिस्तान की किसी दुर्गम गुफा में नहीं बल्कि पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला, जो देश की मुख्य मिलिट्री एकेडमी से दो मील से भी कम दूरी पर था। अमेरिकी सेना ने मई 2011 में उसे वहीं मार गिराया।
यह इतिहास भारतीय विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर करता है जब वॉशिंगटन की नजरें एक बार फिर पूरी तरह से अफगानिस्तान और अब ईरान पर टिक जाती हैं क्योंकि अमेरिका आमतौर पर पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के प्रति नरम रुख अपनाता है।
भारत उठाता रहा है ये सवाल
भारत ने अक्सर सवाल उठाया है कि पाकिस्तान की भूमिका की उतनी बारीकी से जांच क्यों नहीं होती। अफगानिस्तान चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है, लेकिन यह पूरी तरह से बंद नहीं है। इसकी सीमाएं पाकिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन से मिलती हैं। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ही वह मुख्य दक्षिणी दरवाजा रहा है जो अफगानिस्तान को अरब सागर और बाकी दुनिया से जोड़ता है।
अफगान जिहाद और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले उग्रवाद की लॉजिस्टिक्स में पेशावर, कराची और आदिवासी इलाकों की बार-बार भूमिका रही है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान वहां से गुजरने वाले हर आतंकवादी के लिए जिम्मेदार है, लेकिन यह जरूर है कि पाकिस्तान इस पूरी कहानी का एक अहम हिस्सा रहा है।
1993 के बॉम्बे बम धमाके, 2001 में संसद पर हमला और बाद में 2008 के मुंबई हमले दक्षिण एशिया में आतंकवाद के लंबे सिलसिले का ही हिस्सा थे। भारत सरकार ने बार-बार पाकिस्तान में मौजूद उन चरमपंथी संगठनों को उस खतरे का मुख्य हिस्सा बताया है, जिनके तार बड़े पैमाने पर चल रहे जिहाद से जुड़े हैं।
उदाहरण के लिए 26/11 के हमलावर कराची से निकले, उन्होंने भारत की एक मछली पकड़ने वाली नाव को अगवा किया और इतिहास के सबसे खूंखार आतंकवादी हमलों में से एक को अंजाम देने के लिए मुंबई पहुंचे।
बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने इन हमलों के लिए LeT को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन हमले के मास्टरमाइंड को सजा दिलाने में मदद करने के मामले में वे बहुत धीमी गति से आगे बढ़े। हालांकि LeT की स्थापना 1986 में अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुई थी, लेकिन बाद में उसने अपना ध्यान भारत पर केंद्रित कर लिया।
अल-कायदा के एक वरिष्ठ सदस्य अबू जुबैदा को फैसलाबाद में LeT के एक सुरक्षित ठिकाने से पकड़ा गया, जिससे यह पता चलता है कि दोनों नेटवर्क ऑपरेशन के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं।
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