पुरुलिया के इलू में 200 साल पुरानी परंपरा जीवंत, विजयादशमी पर मां दुर्गा को लगता है पांताभात और चेंग मछली का भोग
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया स्थित झालदा के इलू सार्वजनिक ताम्बुली दुर्गा मंदिर में 200 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम ...और पढ़ें

मां दुर्गा को विदाई देने से पहले उन्हें पांताभात और चेंग मछली का विशेष भोग अर्पित किया जाता है।
HighLights
विजयादशमी पर पांताभात और चेंग मछली का विशेष भोग।
पारंपरिक गन्ने की बलि और नाटुआ नृत्य का आयोजन।
संवाद सूत्र, बाघमुंडी (पुरुलिया)। समय के साथ भले ही कई परंपराएं बदल गईं, लेकिन पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित झालदा के इलू सार्वजनिक ताम्बुली दुर्गा मंदिर की करीब 200 साल पुरानी परंपरा आज भी पूरी निष्ठा के साथ कायम है।
ऐतिहासिक गाथाओं और समृद्ध लोकसंस्कृति से जुड़ी इस प्राचीन दुर्गापूजा को लेकर पूरे इलाके में उल्लास और भक्ति का माहौल है।
अपनों से मिलने और जड़ों से जुड़ने का जरिया
रोजगार और आजीविका के सिलसिले में परिवार के कई सदस्य सालभर दूसरे राज्यों व दूर-दराज के इलाकों में रहते हैं। लेकिन शारदीय नवरात्र और दुर्गापूजा के पावन अवसर पर सभी अपने पैतृक घर लौट आते हैं।
अपनी जड़ों से जुड़ने और अपनों से मिलने की चाह में पूरा परिवार एक छत के नीचे इकट्ठा होकर इस उत्सव को धूमधाम से मनाता है। यह पूजा पारिवारिक एकजुटता और सामाजिक सद्भाव की एक अनूठी मिसाल पेश करती है।
गन्ने की बलि और प्राचीन रीति-रिवाज
इस दुर्गापूजा की खास पहचान यहां निभाई जाने वाली प्राचीन धार्मिक परंपराएं हैं। मंदिर में पूरी विधि-विधान और निष्ठा के साथ कुम्हड़े और गन्ने की बलि देकर मां दुर्गा की आराधना की जाती है।
पांताभात और चेंग मछली का अनूठा भोग
इलू दुर्गा पूजा की सबसे खास और अनूठी परंपरा विजयादशमी के दिन देखने को मिलती है। मां दुर्गा को विदाई देने से पहले उन्हें पांताभात (पानी में भिगोया हुआ चावल) और चेंग मछली का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। सदियों पुरानी इस लोकपरंपरा का पालन आज भी ग्रामीण पूरे भक्तिभाव से करते हैं।
ढाक की गूंज और नाटुआ नृत्य
उत्सव को और भव्य बनाने के लिए पूजा के दौरान पारंपरिक मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। ढाक की गूंज के बीच बंगाल की प्राचीन और लुप्तप्राय लोकसंस्कृति का प्रतीक माने जाने वाले 'नाटुआ नृत्य' की प्रस्तुति मंदिर परिसर में अलग ही रंग भर देती है।
ग्रामीण बंगाल की पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली के सुंदर मेल का प्रतीक बन चुकी यह दुर्गापूजा आज भी पूरे क्षेत्र में सामूहिक उल्लास का केंद्र बनी हुई है।
