रोजगार देने वाले उद्योगों को अधिक प्रोत्साहन, बंगाल की नई उद्योग नीति में भूमि और बिजली पर रहेगा जोर
पश्चिम बंगाल सरकार नई औद्योगिक नीति ला रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य निवेश को रोजगार सृजन से जोड़ना है।
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रोजगार सृजन से जोड़कर उद्योगों को मिलेगा अधिक प्रोत्साहन

समय कम है?
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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में औद्योगिक निवेश को गति देने के लिए राज्य सरकार की नई उद्योग नीति से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं। सरकार इस बार केवल कंपनियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि प्रोत्साहन राशि को रोजगार सृजन से जोड़ने, जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया सरल बनाने और औद्योगिक मंजूरियों में होने वाली देरी दूर करने पर जोर दे रही है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 14 अक्टूबर को हल्दिया में नई उद्योग नीति और प्रोत्साहन नीति दिवाली से पहले लाने की घोषणा की थी। मंत्रियों के समूह ने नीति का मसौदा मंजूर कर लिया है, लेकिन अंतिम प्रावधानों और उनके लागू होने की स्थिति पर कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही तस्वीर स्पष्ट होगी।
नई नीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए जमीन, बिजली की लागत, सरकारी मंजूरियों और पुराने औद्योगिक प्रोत्साहनों से जुड़े सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं। सरकार की कोशिश है कि इन मुद्दों पर स्पष्ट नियम बनाकर निवेशकों को भरोसेमंद व्यवस्था दी जाए।
रोजगार के हिसाब से तय हो सकते हैं प्रोत्साहन
प्रस्तावित नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उद्योगों को मिलने वाली सुविधाओं को रोजगार सृजन से जोड़ना है। सूत्रों के अनुसार सरकार किसी इकाई में नियुक्त कर्मचारियों की संख्या के आधार पर उसके कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) खर्च का एक हिस्सा वहन करने पर विचार कर रही है।
अधिक रोजगार देने वाली इकाइयों को अधिक सहायता मिल सकती है। बिजली शुल्क में छूट और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास में मदद भी संभावित प्रोत्साहनों में शामिल हैं। नीति में राज्य के पिछड़े जिलों में उद्योग लगाने वाली कंपनियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देने की भी तैयारी बताई गई है।
पुरुलिया, झाड़ग्राम, बांकुड़ा, कूचबिहार तथा उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर जैसे जिलों में निवेश बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे औद्योगिक गतिविधियों को कोलकाता, हावड़ा और हल्दिया जैसे पारंपरिक केंद्रों से आगे फैलाने में मदद मिल सकती है।
एमएसएमई को भी नीति में महत्वपूर्ण स्थान मिलने की उम्मीद
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को भी नीति में महत्वपूर्ण स्थान मिलने की उम्मीद है। छोटे उद्योग बड़े कारखानों की तुलना में कम पूंजी में रोजगार पैदा कर सकते हैं और स्थानीय आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाते हैं। इसलिए वित्तीय सहायता, समय पर भुगतान, आसान ऋण और बाजार तक पहुंच जैसे विषय भी नीति की प्रभावशीलता तय करेंगे।
जमीन और मंजूरियों की बाधा दूर करना बड़ी चुनौती
नई उद्योग नीति के साथ औद्योगिक भूमि की पारदर्शी व्यवस्था सरकार की दूसरी बड़ी प्राथमिकता है। प्रस्तावित माडल में सीधे जमीन खरीदने और भूमि पूलिंग के विकल्पों पर जोर है। भूमि पूलिंग के तहत जमीन मालिकों की भागीदारी से औद्योगिक विकास के लिए जमीन उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
सरकार का कहना है कि निवेशकों और जमीन मालिकों, दोनों के हितों की रक्षा करते हुए औद्योगिक परियोजनाओं का रास्ता आसान किया जाएगा। इसके साथ एकल खिड़की व्यवस्था के जरिये विभिन्न विभागों की मंजूरियां एक ही प्रणाली से उपलब्ध कराने की योजना भी महत्वपूर्ण है।
अग्निशमन, वन विभाग और भूमि के उपयोग में बदलाव जैसी स्वीकृतियों के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ने से परियोजनाओं में देरी होती है। यदि समयबद्ध मंजूरी और जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है, तो निवेशकों के लिए परियोजना शुरू करना आसान हो सकता है। लेकिन प्रोत्साहन नीति के सामने वित्तीय चुनौती भी है।
