बंगाल का रण: क्या है भाजपा की 'Two Way' रणनीति? ममता ने चला 'सोशल इंजीनियरिंग' का दांव
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए भाजपा ने उत्तर बंगाल को सुरक्षित रखने और दक्षिण में सेंध लगाने की 'टू-वे' रणनीति अपनाई है।

भाजपा और TMC का बंगाल चुनाव पर क्या है प्लान?

समय कम है?
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जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का बिगुल फूंकते ही राज्य की सियासत में आंकड़ों, भूगोल और सामाजिक समीकरणों का एक महासमर शुरू गया है।
भाजपा ने अपनी पहली सूची के जरिए जहां उत्तर बंगाल के अपने 'अजेय' दुर्ग को सुरक्षित रखने और दक्षिण बंगाल में ममता बनर्जी के मजबूत किले में 'सेंध' लगाने की 'टू-वे' रणनीति पेश की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने 291 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर 'सोशल इंजीनियरिंग' का एक ऐसा दांव चला है जो जातीय और क्षेत्रीय पहचान के संगम पर टिका है।
भाजपा की रणनीति में इस बार केवल चुनावी हवा बनाने का प्रयास नहीं, बल्कि 'सीट-दर-सीट' घेराबंदी की स्पष्ट झलक मिल रही है, जिसमें उत्तर में साख बचाने की छटपटाहट और दक्षिण में आक्रामक विस्तार की भूख साफ नजर आती है।

भाजपा को मिला है उत्तर का साथ
उत्तर बंगाल भाजपा के लिए वह उर्वर जमीन रही है जिसने 2019 से लेकर 2024 तक के हर चुनाव में पार्टी की लाज बचाई है। इस क्षेत्र के आठ जिलों की 54 विधानसभा सीटें सत्ता के लिए अहम हैं।
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा यहां लगभग 47 प्रतिशत मत प्राप्त कर 30 सीटें जीतने में सफल रही थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस 42 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 23 सीटों पर सिमट गई थी।
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इन जिलों की जनसांख्यिकी बेहद जटिल है, जहां अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसी) की आबादी लगभग 50 प्रतिशत है, वहीं मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है।
मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में तो मुस्लिम आबादी अब 55 से 60 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। भाजपा ने यहां शंकर घोष और सुकुमार राय जैसे पुराने दिग्गजों को फिर से उतारकर राजबंशी और गोरखा समुदायों को यह संदेश दिया है कि वह अपने आधार वोट बैंक के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
दक्षिण में है घमासान
असली सियासी घमासान दक्षिण बंगाल के चार महत्वपूर्ण जिलों—मुर्शिदाबाद, बीरभूम, पूर्व और पश्चिम बर्द्धमान में केंद्रित है। इन 58 सीटों पर पिछला प्रदर्शन भाजपा के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था, जहां तृणमूल ने 52 सीटें जीती थीं और भाजपा महज छह सीटों पर सिमट गई थी।
इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी का घनत्व निर्णायक है; मुर्शिदाबाद में यह 70 प्रतिशत के पार है तो बीरभूम में 41 प्रतिशत से अधिक। भाजपा ने इस बार यहां 34 प्रतिशत के अपने पिछले वोट शेयर को बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। यही वजह है कि बीरभूम हो या फिर मुर्शिदाबाद भाजपा अपने पुराने कार्यकर्ताओं पर भरोसे के साथ नए को जोड़कर आगे बढ़ रही है।

भाजपा के वोट पर है नजर
दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने अपनी सूची में 52 महिलाओं को जगह देकर और उत्तर व दक्षिण 24 परगना से लेकर उत्तर बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों तक स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता देकर भाजपा के 'हिंदुत्व कार्ड' की काट ढूंढ रही हैं।
तृणमूल ने मालदा-मुर्शिदाबाद में मुस्लिम उम्मीदवारों के जरिए मतों के बिखराव को रोकने की कोशिश में है, तो वहीं एससी-एसटी सीटों पर मजबूत स्थानीय चेहरों को उतारकर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में है।
अब मुकाबला इस बात पर टिका है कि क्या भाजपा दक्षिण बंगाल के दुर्ग में घुसपैठ कर पाएगी या ममता बनर्जी की सोशल इंजीनियरिंग की दीवार भगवा लहर को एक बार फिर हुगली के तट पर रोक देगी।
