बंगाल में डेमोग्राफिक बदलाव बना बड़ा फैक्टर, घुसपैठ और जनसंख्या बदलाव ने बढ़ाई चिंता
बंगाल में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव का मुद्दा गरमा गया है। राज्य की ...और पढ़ें

बंगाल में डेमोग्राफी बदलाव का प्रश्न केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है

समय कम है?
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राजीव कुमार झा, कोलकाता। बंगाल में विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही एक बार फिर सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और डेमोग्राफी में बदलाव का मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है। बंगाल की करीब 2,216 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश के साथ लगती है, जो देश की सबसे लंबी, जटिल और संवेदनशील सीमाओं में गिनी जाती है।
बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण पिछले कुछ वर्षों में विशेषकर राज्य के सीमावर्ती जिलों में जनसंख्या संरचना में तेजी से आए बदलाव, अंतरराष्ट्रीय सीमा के बड़े हिस्से में अब भी तारबंदी नहीं होना और घुसपैठ के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।
बीते दशकों में कई इलाकों में आबादी में वृद्धि की दर भी औसत से कहीं अधिक रही है, जो इस बिंदु पर सवाल के साथ चिंता भी खड़े करती है। राज्य के सीमावर्ती जिलों विशेषकर मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर तथा उत्तर व दक्षिण 24 परगना में जनसंख्या वृद्धि दर औसत से अधिक दर्ज की गई है।
2001 से 2011 के बीच मुर्शिदाबाद की आबादी में लगभग 21 प्रतिशत और मालदा में करीब 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो राज्य की औसत वृद्धि (13-14 प्रतिशत) से काफी ज्यादा है। सूबे के नौ जिलों- मुर्शिदाबाद, मालदा, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, नदिया, उत्तर व दक्षिण 24 परगना की सीमा बांग्लादेश के साथ लगती है।
हर साल सीमा पर पकड़े जाते हैं छह-सात हजार घुसपैठिए
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में हर साल बंगाल सीमा से औसतन 6,000 से 7,000 घुसपैठियों को सीमा पार करते पकड़ा गया है। बीएसएफ सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में दक्षिण व उत्तर बंगाल फ्रंटियर इलाके से अवैध तरीके से सीमा आर-पार करते पकड़े जाने से लेकर पुशबैक (घुसपैठियों को वापस भेजने की कार्रवाई) को मिलाकर 25,000 से ज्यादा मामले पकड़े गए।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि पकड़े गए लोगों की संख्या वास्तविक घुसपैठ का केवल एक मामूली हिस्सा भर है। पिछले साल बंगाल में एसआईआर की घोषणा के बाद डर के चलते बड़ी संख्या में घुसपैठिए वापस भी भागे। कई जिलों में मुस्लिम आबादी बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंची बंगाल में डेमोग्राफी बदलाव का प्रश्न केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर चुनावी गणित पर भी पड़ता है।
कई सीमावर्ती विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संरचना में बदलाव ने राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया है। बीते दशकों में बांग्लादेश से लगे जिलों मुर्शिदाबाद व मालदा में मुस्लिम आबादी बढ़कर 55-60 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना आदि जिलों में चुनाव के दौरान निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
सीमा के 550 किलोमीटर से अधिक हिस्से में अब भी फेंसिंग नहीं
बीएसएफ के अनुसार सीमा पर कड़ी निगरानी व्यवस्था के बावजूद कई इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियां चुनौती पैदा करती है, जिसके चलते पूरी तरह से घुसपैठ रोक पाना चुनौती बना हुआ है। कई जगहों पर नदियों, दलदली जमीन और आबादी वाले इलाकों के बीच से सीमा गुजरती है, जिसकी निगरानी आसान नहीं है।
जमीन अधिग्रहण संबंधी जटिलताओं के कारण लगभग 550 किलोमीटर से अधिक हिस्से में अब भी फेंसिंग नहीं है, जिससे अवैध आवाजाही और तस्करी की घटनाएं होती रहती हैं। मवेशी तस्करी, नकली नोट और अन्य अवैध गतिविधियां भी इसी के साथ जुड़ी हुई हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार का तर्क है कि सीमा सुरक्षा पूरी तरह केंद्र के अधीन विषय है और इसमें किसी भी तरह की कमी के लिए केंद्र जिम्मेदार है।
