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जितनी लोकप्रियता, उतनी अधिक फंडिंग... कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों की भीड़ के पीछे बड़ा गणित

Published: Sun, 18 Oct 2026 02:55 PM (IST)

कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों में अब भीड़ जुटाना एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा बन गया है, जिसका सीधा संबंध कॉर्पोरेट ...और पढ़ें

कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों की भीड़ के पीछे बड़ा गणित (फोटो- PTI )

कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों की भीड़ के पीछे बड़ा गणित (फोटो- PTI )

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विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता । कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों में पहले स्वतः स्फूर्त भीड़ उमड़ती थी, अब भीड़ जुटाई जाती है। इसके पीछे एक पूरा गणित काम करता है। जितनी अधिक भीड़, उतनी लोकप्रियता और पूजा समितियों को कंपनियों से उतनी ही अधिक फंडिंग।

दूसरी तरफ कंपनियों को चंद दिनों में आसानी से अपने संभावित ग्राहकों के एक बड़े वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता है।

पूजा समितियां हर साल एक से बढ़कर एक थीम की परिकल्पना करती है। उनपर पंडाल निर्मित किए जाते हैं और उनके प्रचार के लिए आक्रामक रणनीति तैयार होती है। दुर्गापूजा के महीनों पहले से ये तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

भीड़ जुटाना जरूरी भी, बाध्यता भी

उत्तर कोलकाता की प्रमुख दुर्गापूजा समिति दमदम पार्क के संयुक्त सचिव मलय दे बताते है कि कोलकाता की दुर्गापूजा का स्वरूप साल-दर- साल बड़ा होता जा रहा है। प्रत्येक पूजा समिति का बजट बढ़ रहा है। बड़ी पूजा समिति के लिए अब बगैर कारपोरेट स्पांसरशिप के पूजा का आयोजन करना संभव नहीं है।

पूजा का 60-70 प्रतिशत खर्च अब कंपनियां ही वहन करती हैं। कंपनियां स्पांसरशिप के लिए पूजा समितियों की लोकप्रियता और उनके पंडालों में उमड़ने वाली भीड़ को ही मुख्य आधार बनाती हैं। ऐसे में मोटी स्पांसरशिप पाने के लिए हर साल अपने पंडाल में भारी भीड़ जुटाना पूजा समितियों के लिए एक तरह से बाध्यता हो जाती है।

मलय आगे कहते हैं कि इसका एक दूसरा पहलू भी है। आजकल जन जागरूकता आधारित थीम पर काम अधिक हो रहा है। पूजा समितियां चाहती हैं कि अधिक से अधिक लोग पंडाल में आकर उनका थीम देखें ताकि उनका उद्देश्य सार्थक हो। इस कारण भी वे अपनी थीम का जमकर प्रचार करते हैं।

अब भीड़ से ही होती है ब्रांडिंग

हावड़ा की प्रमुख दुर्गापूजा समिति सलकिया अग्रदूत के कोषाध्यक्ष सब्यसाची राय के मुताबिक पंडालों में भीड़ अब सिर्फ आस्था, उत्साह और कलात्मकता के प्रति आकर्षण का नतीजा नहीं है। अब भीड़ से ही पूजा समितियों की ब्रांडिंग होती है। इसलिए थीम को लेकर 'हाइप' तैयार किया जाता है।

बड़ी पूजा कमेटियां अब प्रचार को पेशेवर तरीके से संचालित करती हैं। उनकी अपनी जनसंपर्क टीम होती हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग, इंटरनेट मीडिया पर लगातार पोस्ट, वीडियो तथा प्रचार के दूसरे माध्यमों के जरिए लोगों में थीम के प्रति उत्सुकता पैदा की जाती है।

इसका एक और कारण पूजा दर्शनार्थियों की पूजा आयोजकों से बढ़ती उम्मीदें भी हैं। लोग अब कुछ अलग देखना चाहते हैं, वरना घंटों किसी पंडाल के सामने कौन कतार में खड़ा रहना चाहेगा। समग्र रूप से यह एक बड़ा इकोसिस्टम है, जिसमें सभी भागीदार हैं।

भगदड़ की घटना ने दी है बड़ी सीख

सब्यसाची कहते हैं कि चोरबागान में भगदड़ की घटना ने बड़ी सीख दी है। बड़ी भीड़ जुटाना अपने साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आती है। पंडालों के प्रवेश व निकास मार्ग, कतारों का प्रबंधन, आपातकालीन निकासी, अग्निशमन और चिकित्सा सहायता जैसे इंतजाम उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने आकर्षक थीम और पंडाल। भीड़ जुटाने की होड़ में लोगों की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।