कोलकाता, जागरण संवाददाता। सारधा चिटफंड की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का दबाव बढ़ते ही वीरभूम से तृणमूल कांग्रेस की सांसद शताब्दी राय ने समूह से मिली 30 लाख 64 हजार रुपये की रकम ईडी को लौटा दी। उक्त रकम को ड्राफ्ट के जरिए ईडी कार्यालय में भेजी गई है। रुपये लौटाने के बाद सांसद ने आरोप लगाया कि जांच के नाम पर बार बार तलब कर ईडी उन्हें परेशान कर रही थी। शांति पाने के लिए ही उन्होंने रकम को लौटाने का निर्णय लिया था। वह सांसद नहीं बल्कि एक कलाकार की हैसियत से सारधा ग्रुप की ब्रांड अंबेसडर बनी थी।

सूत्रों के अनुसार, ईडी का नोटिस मिलने के बाद वीरभूम की सांसद व अभिनेत्री शताब्दी राय ने पत्र भेजकर सारधा से मिली रकम को लौटाने का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने अभिनेता व तृणमूल कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य मिठुन चक्रर्ती की राह को अपनाया था। ईडी ने गत 12 जुलाई को पूछताछ के लिए सांसद को तलब किया था, लेकिन वह नहीं पहुंची थीं। इसके बाद गत आठ अगस्त को शताब्दी ईडी कार्यालय में पेश हुई थीं। वादे के मुताबिक, उन्होंने बुधवार को 30.64 लाख का ड्राफ्ट ईडी कार्यालय में भिजवा दिया। रुपये लौटाने के बाद सांसद शताब्दी राय पर ईडी पर आरोप जड़ दिए।

कहा कि पूछताछ के नाम पर बार बार उन्हें तलब कर परेशान किया जा रहा था। इससे मेरा समय भी बर्बाद हो रहा था। जीवन में शांति लाने के लिए ही रकम लौटाने का निर्णय लिया था। उन्होंने दावा किया कि वह राजनीतिक हैसियत से नहीं बल्कि एक कलाकार होने के नाते सारधा गु्रप की ब्रांड अंबेसडर थीं। उधर, संसद में नया चिटफंड बिल पास हो जाने के अब निवेशकों को उनकी रकम शीघ्र वापस मिल सकेगी। नए कानून के तहत चिटफंड कंपनियों की जब्त संपत्ति को भी नीलाम करने का अधिकारी दिया गया है। इसके अलावा सीबीआइ बिना राज्य सरकार की अनुमति के चिटफंड मामलों की जांच कर सकेगी।

जानें, क्या है चिटफंड मामला
चिट फंड्स एक्ट 1982 में ऐसी कंपनियों को परिभाषित किया गया है। इसके अलावा राज्यों में बने कानून इस बिजनेस को नियंत्रित करते हैं। चिट फंड बचत का एक तरीका है, जो लोगों को आसान कर्ज उपलब्ध कराने के साथ ही उनके निवेश पर ज्यादा रिटर्न देता है। बैंक से कर्ज लेने के लिए आम तौर पर कई छोटी-मोटी लेकिन जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करना होता है, लेकिन चिट फंड में इसकी कोई बाध्यता नहीं होती। निवेश के अन्य विकल्पों के मुकाबले चिट फंड में ज्यादा रिटर्न मिलता है और कई बार यही लालच लोगों के नुकसान का कारण भी बनता है।

ऐसे हुई सारदा ग्रुप की शुरुआत
2000 के शुरुआती महीनों में कारोबारी सुदीप्तो सेन ने सारदा ग्रुप की शुरुआत की, जिसे सेबी ने बाद में कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम के तौर पर वर्गीकृत किया। सारदा ग्रुप ने चिट फंड की तर्ज पर ज्यादा रिटर्न का लालच देकर छोटे निवेशकों को आकर्षित किया। अन्य पोंजी स्कीम (चिट फंट कंपनी) की तरह कंपनी ने एजेंट के बड़े नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए छोटे लोगों से पैसों की उगाही की और इसके लिए एजेंट को 25 फीसद तक का कमीशन दिया गया। कुछ ही सालों में सारदा ने करीब 2,500 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटा ली। स्कीम का दायरा ओडिशा, असम और त्रिपुरा तक फैला, जिसमें करीब 17 लाख से अधिक लोगों ने पैसे लगाए।

सैकड़ों निवेशकों ने दर्ज कराया था मामला
2012 में सेबी ने इस समूह को लोगों से पैसा जुटाने के लिए मना किया। 2013 तक आते-आते ग्रुप की हालत खराब होने लगी। कंपनी के पास आने वाली पूंजी की मात्रा, खर्च हो रही पूंजी से कम हो गई, और फिर अप्रैल 2013 में यह धराशायी हो गई। कोलकाता के विधाननगर पुलिस स्टेशन में सैंकड़ों निवेशकों ने शिकायत दर्ज कराई। सुदीप्तो सेन ने 18 पन्नों का पत्र लिखकर बताया कि कैसे नेताओं ने उनसे जबरन गलत जगह निवेश कराया। सेन के खिलाफ एफआईआर हुई और आखिरकार उन्हें 20 अप्रैल, 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया।

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Posted By: Sachin Mishra

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