कोलकाता, विशाल श्रेष्ठ। कहते हैं ज्यादा मिठाइयां मर्ज लेकर आती हैं, लेकिन कोलकाता के रवींद्र कुमार पाल (79) ने मिठाइयों को ही दवाओं का रूप दे दिया है। दमा, पीलिया, एसिडिटी, उदरशूल और ब्रोंकाइटिस की समस्या है तो गाजर के रसगुल्ले चख लीजिए। सर्दी-खांसी या चेचक-खसरा से पीड़ित हैं तो तुलसी की दही का सेवन कीजिए। दिल की बीमारियों के लिए अर्जुन स्पंदन नामक संदेश है। याददाश्त कमजोर है तो ब्राह्मी स्मृति आजमाएं। नींद नहीं आती तो सुसनी साउंड स्लीप खा लीजिए और शरीर में खून की कमी है तो उसके लिए कुलेखारा मुक्ति है।

ये मिठाइयां अल्सर, अपच, मिर्गी, नसों में दर्द, किडनी व गॉल ब्लैडर में स्टोन, अत्यधिक रक्तस्राव और उच्च रक्तचाप में भी कारगर हैं। रवींद्र की कोलकाता में ही हिंदुस्तान स्वीट्स नाम से मिठाई की दुकान है। उनकी मिठाइयां खाकर कई लोगों को फायदा मिला है। 

सबसे पहले लेकर आए गाजर के रसगुल्ले

पाल ने कहा-जब हर्बल दवाएं और सौंदर्य प्रसाधन हो सकते हैं तो हर्बल मिठाइयां क्यों नहीं? इसी सोच के साथ मैंने दो दशक पहले काम शुरू किया। ढाई वर्षों के गहन अनुसंधान के बाद हमने 2000 में सबसे पहले गाजर के रसगुल्ले तैयार किए। गाजर में कैरोटिना नामक तत्व होता है। इसमें सेहत के लिए फायदेमंद

एंटी-ऑक्सीडेंट के गुण होते हैं। यह खास रसगुल्ला तैयार करने में कोलकाता के ही जादवपुर विश्वविद्यालय के फूड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट से तकनीकी सहयोग लिया गया। इसके बाद हम एक-एक कर सुशनी साउंड

स्लीप संदेश, तुलसी दही, अर्जुन स्पंदन, ब्राह्मी  स्मृति, कुलेखाड़ा मुक्ति व सोयाबीन सोया रसगुल्ला लेकर आए।

औषधीय गुणों का रखते हैं ख्याल

रवींद्र ने आगे बताया कि इन मिठाइयों को तैयार करने में इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि इनमें

प्रयुक्त होने वाले औषधीय पौधों के गुण बने रहे। इसीलिए गाजर व किसी भी औषधीय पौधे को उबाला नहीं जाता। मिठाई तैयार करने से पहले उन्हें औषधि मिश्रित जल में भिगोकर रखा जाता है, ताकि उसमें मौजूद रोग के जीवाणु मर जाएं। क्वालिटी कंट्रोल लैब में कच्चे माल की गहन जांच की जाती है। मिठाइयां तैयार हो जाने पर माइक्रो बायोलॉजी लैब उनकी एक बार फिर जांच की जाती है।

डॉक्टर भी दे रहे सेवन की सलाह

पश्चिम बंग मिष्ठान व्यवसायी समिति के अध्यक्ष रवींद्र कुमार पाल ने कहा, हमारे पास ऐसे बहुत से लोग

आते हैं, जो अपने डॉक्टर के परामर्श पर इन मिठाइयों का नियमित रूप से सेवन कर रहे हैं और उन्हें इससे फायदा भी हो रहा है। कई देशों में भी हमारी औषधीय मिठाइयों की आपूर्ति होती है। खासकर अमेरिकी देशों में। हमारी ये मिठाइयां भारत सरकार से पेटेंट की हुई हैं। मिठाइयां बनाने में इस्तेमाल औषधीय पौधों की रामकृष्ण मिशन, नरेंद्रपुर से पूर्ति की जाती है। हमारा आइआइटी खड़गपुर से आधिकारिक तौर पर करार है। साथ ही हम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी की मदद भी लेते हैं।

सात दशकों से मिठाइयों के कारोबार में 

रवींद्र कुमार पाल सात दशकों से मिठाई के कारोबार में हैं। यह उनका खानदानी कारोबार है। 1947 में देश बंटवारे के बाद बांग्लादेश से उनका परिवार कोलकाता आ गया था और उन्हें यहां हिंदुस्तान स्वीट्स की शुरुआत की, जिसकी अब 11 दुकानें हैं। 

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Posted By: Babita kashyap

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