कोलकाता के सिंघी पार्क पूजा पंडाल में दिखेगी छत्तीसगढ़ की झलक, 'बस्तरीय' थीम पर जीवंत होगी आदिवासी कला और संस्कृति
सिंघी पार्क सार्वजनीन दुर्गापूजा समिति इस वर्ष अपनी 85वीं प्रस्तुति में 'बस्तरीय' थीम के तहत छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध आदिवासी कला-संस्कृति और जीवनशैली को प्रदर्शित करेगी।

सिंघी पार्क पूजा पंडाल में दिखेगी छत्तीसगढ़ की झलक
HighLights
सिंघी पार्क दुर्गा पूजा में 'बस्तरीय' थीम पर आधारित प्रस्तुति।
बस्तर की आदिवासी कला, ढोकरा शिल्प और जीवनशैली का प्रदर्शन।
प्राकृतिक रंगों और पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग कर पंडाल निर्माण।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता । सिंघी पार्क सार्वजनीन दुर्गापूजा समिति के पूजा पंडाल में इस बार छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध कला-संस्कृति की अद्भुत झलक देखने को मिलेगी। 85वें वर्ष की प्रस्तुति ‘बस्तरीय’ नाम से होगी।
पंडाल में बस्तर की आदिवासी कला व हस्तशिल्प के साथ वहां की पारंपरिक जीवनशैली व प्रकृति के गहरे संबंध को भी रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा।

सिंघी पार्क की पूजा को-आर्डिनेटर सौमा मजूमदार ने बताया-‘कला केवल सुंदरता की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, संस्कृति, विश्वास और जीवनदर्शन का प्रतिबिंब भी होती है। इसी सोच के साथ समिति ने बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को मूल विषय वस्तु बनाया है।

बस्तर के आदिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट कला शैलियों, हस्तशिल्प और प्रकृति आधारित जीवनशैली के माध्यम से अनूठी सांस्कृतिक पहचान कायम की है। हम अपने पंडाल के माध्यम से उसी विरासत को सम्मान देने की कोशिश करेंगे।’
मिट्टी, प्रकृति और धातु शिल्प की कहानी
बस्तर की कला की सबसे बड़ी विशेषता प्रकृति के साथ वहां के लोगों का गहरा संबंध है। वहां की रूखी और शुष्क जलवायु तथा लाल मिट्टी की गरमाहट वहां की कला और शिल्प में भी दिखाई देती है। पंडाल में बस्तर की प्रसिद्ध ढोकरा कला से प्रेरित धातु शिल्प को विशेष रूप से उभारा जाएगा।
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ढोकरा शिल्प में धातु को आग में पिघलाकर मोम के सांचे में ढाला जाता है और बाद में उसे पीटकर अलग-अलग आकृतियां दी जाती हैं। इसी शिल्प शैली से प्रेरित डिजाइन और अलंकरण मंडप के विभिन्न हिस्सों में नजर आएंगे। इसके साथ लकड़ी, बांस और बेंत की कारीगरी तथा आदिवासी अलंकरण शैली के तत्वों को भी रचनात्मक ढंग से शामिल किया जाएगा।
प्रवेश द्वार से मुख्य पंडाल तक बस्तर की छाप
प्रवेश द्वार से लेकर मुख्य मंडप, रोशनी, शिल्प और सजावट तक हर स्तर पर ऐसे डिजाइन और प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, जो बस्तर की विशिष्ट कला भाषा को जीवंत करेंगे। धातु की मूर्तिकला जैसी आकृतियों और अलंकरणों के माध्यम से पारंपरिक कला को आधुनिक प्रस्तुति से जोड़ा जाएगा।
पंडाल में मिट्टी की प्राकृतिक आभा बनाए रखने के लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाएगा। पर्यावरण अनुकूल सामग्री के जरिए बस्तर के प्राकृतिक परिवेश का प्रभाव पैदा करने की कोशिश होगी। इससे पंडाल में मिट्टी की सौंधी रंगत और आदिवासी कला की सहजता एक साथ दिखाई देगी।
ऊपरी हिस्से में दिखेगा बस्तर का गांव
पंडाल के ऊपरी हिस्से में बस्तर के एक गांव की बाहरी रूपरेखा उकेरी जाएगी। यह रेखाचित्र छत्तीसगढ़ की पहाड़ी घाटियों और ऊंची-नीची पहाड़ियों की प्राकृतिक बनावट की याद दिलाएगा यानी पंडाल में बस्तर की कला के साथ वहां के भौगोलिक परिवेश की झलक भी मिलेगी।
सिंघी पार्क की इस प्रस्तुति में बस्तर को केवल सजावट की थीम के रूप में नहीं, बल्कि उसकी कला, प्रकृति और आदिवासी जीवनदर्शन के साथ सामने लाने का प्रयास किया गया है। ‘बस्तरीय’ के जरिए पूजा पंडाल एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा का रूप लेगा, जहां दर्शक बस्तर की कला विरासत से रूबरू हो सकेंगे। पंडाल की परिकल्पना को भूमि क्रिएशन की अंकिता बनर्जी साकार कर रही हैं।
