कोलकाता में स्वदेशी पोत 'ओआरवी सागर मंथन' लॉन्च, भारत के समुद्री अनुसंधान को मिली नई ताकत
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कोलकाता में अत्याधुनिक स्वदेशी महासागरीय अनुसंधान पोत 'ओआरवी सागर मंथन' का जलावतरण किया। यह ...और पढ़ें

केंद्रीय मंत्री ने उन्नत स्वदेशी पोत ‘ओआरवी सागर मंथन’ किया लॉन्च
HighLights
केंद्रीय मंत्री ने कोलकाता में 'ओआरवी सागर मंथन' का जलावतरण किया।
यह स्वदेशी पोत समुद्री अनुसंधान को नई गति प्रदान करेगा।
'सागर मंथन' 43 साल पुराने 'सागर कन्या' का स्थान लेगा।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। भारत के स्वदेशी समुद्री अनुसंधान को बढ़ावा व नई गति देने के उद्देश्य से बुधवार को कोलकाता स्थित ऋषि बंकिम शिपयार्ड में अत्याधुनिक महासागरीय अनुसंधान पोत ओआरवी सागर मंथन का जलावतरण (लॉन्च) किया गया।
केंद्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी व पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और उनकी पत्नी मंजू सिंह ने वर्चुअल माध्यम से इसका जलावतरण किया।
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अंतर्गत राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) के लिए कोलकाता स्थित रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) द्वारा डिजाइन व निर्मित इस पोत का परंपरा के अनुसार केंद्रीय मंत्री की पत्नी मंजू सिंह ने नामकरण किया।
इस अवसर पर कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान सचिव डा. टी. श्रीनिवास कुमार और उनकी पत्नी कविता एलंती सहित जीआरएसई के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक (सीएमडी) कमोडोर पीआर हरि व अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
जीआरएसई अधिकारियों के अनुसार, दीप महासागर मिशन के गहन महासागर सर्वेक्षण एवं अन्वेषण कार्यक्रम के तहत करीब 840 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह पोत हर मौसम में समुद्री अनुसंधान करने में सक्षम होगा। इसे दक्षिणी महासागर समेत कठिन समुद्री परिस्थितियों में संचालन के लिए तैयार किया गया है।
इसमें डायनामिक पोजिशनिंग, मल्टीबीम सर्वेक्षण, मल्टीचैनल भूकंपीय प्रणाली, सब-बाटम प्रोफाइलिंग, मौसम रडार तथा दूर से संचालित और स्वायत्त पानी के भीतर चलने वाले वाहनों की तैनाती की सुविधा है।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह जीआरएसई द्वारा निर्मित भारत का पहला उन्नत महासागरीय अनुसंधान पोत है। उन्होंने कहा कि समुद्रों से जुटाया गया वैज्ञानिक आंकड़ा आपदा प्रबंधन, जलवायु अध्ययन, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक महासागरीय भू-राजनीति में भारत की भूमिका मजबूत करने में महत्वपूर्ण होगा।
उन्होंने अनुबंध पर हस्ताक्षर के महज दो साल के भीतर और कील बिछाने के महज पांच महीने बाद ही जलावतरण पूरा करने के लिए जीआरएसई टीम की सराहना करते हुए इसे दक्षता का असाधारण प्रदर्शन बताया।
दरअसल, जलावतरण का मतलब पोत को पहली बार जल में उतारकर निर्माण के अगले चरण की शुरुआत होता है।
सागर कन्या की जगह लेगा नया पोत
ओआरवी सागर मंथन धीरे-धीरे 43 साल पुराने ओआरवी सागर कन्या का स्थान लेगा, जिसे भारत ने 1983 में जर्मनी से खरीदा था। नए पोत से हिंद महासागर के मध्य-महासागरीय कटक पर बहुधात्विक हाइड्रोथर्मल सल्फाइड खनिजों की खोज, समुद्री पर्यावरण की आधार रेखा तैयार करने, वायुमंडलीय आंकड़े जुटाने और समुद्री जल की वैज्ञानिक जांच में मदद मिलेगी।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डा. टी. श्रीनिवास कुमार ने कहा कि भारत अब विदेशों से अनुसंधान पोत हासिल करने के बजाय ऐसे जटिल समुद्री अनुसंधान मंचों का निर्माण देश में करने की क्षमता विकसित कर चुका है। जुलाई 2024 में अनुबंध के बाद नवंबर 2024 में पहली स्टील कटिंग और आठ अप्रैल, 2026 को इस पोत के निर्माण की कील रखी गई थी।
जलावतरण के बाद इस पोत पर अब सुपरस्ट्रक्चर निर्माण और उपकरणों की फिटिंग होगी और यह विभिन्न समुद्री परीक्षण के दौर से गुजरेगा। वर्ष 2028 में इसे एनसीपीओआर को सौंपे जाने का लक्ष्य है।
