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नंदीग्राम में समर्थन, रेजीनगर में आमने-सामने; बंगाल उपचुनाव से तय होगी कांग्रेस-तृणमूल रिश्तों की दिशा

Published: Wed, 30 Sep 2026 11:23 PM (IST)

नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के भविष्य के संबंधों की दिशा तय करेंगे।

बंगाल उपचुनाव से तय होगी कांग्रेस-तृणमूल रिश्तों की दिशा। (एएनआई)

बंगाल उपचुनाव से तय होगी कांग्रेस-तृणमूल रिश्तों की दिशा। (एएनआई)

HighLights

  1. नंदीग्राम, रेजीनगर उपचुनाव कांग्रेस-तृणमूल संबंधों की दिशा तय करेंगे।

  2. नंदीग्राम में रणनीतिक सहयोग, रेजीनगर में अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे।

  3. भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने पर कांग्रेस में मतभेद।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी नीत गुट के बीच भविष्य के रिश्तों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

नंदीग्राम में दोनों पक्षों के बीच बना रणनीतिक सहयोग और रेजीनगर में अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला इस बात की परीक्षा है कि भाजपा के खिलाफ दोनों दलों के बीच चुनावी तालमेल कितना प्रभावी हो सकता है।

नंदीग्राम सीट का ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में विशेष महत्व 

पूर्व मेदिनीपुर की नंदीग्राम सीट ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में विशेष महत्व रखती है। भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने सिंगुर के साथ नंदीग्राम में भी उन्हें मजबूत राजनीतिक आधार दिया था। 2011 में कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन ने राज्य में वाम मोर्चे के 34 वर्ष लंबे शासन का अंत किया था। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी के हाथों पराजित हुई थीं।

इस उपचुनाव में ममता गुट ने संचिता प्रधान दे को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन शुभेंदु अधिकारी से हाल में मुलाकात के बाद उनके चुनाव से हटने पर ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन की घोषणा कर दी थी। उन्होंने कहा था कि यह कदम विपक्षी गठबंधन ‘आइएनडीआइए’ को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद चल रहा है और निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव के लिए दोनों पक्षों को अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं।

इसके विपरीत रेजीनगर में कांग्रेस और ममता गुट अलग-अलग मैदान में हैं। इससे यह आकलन करने का अवसर मिलेगा कि दोनों दल एक-दूसरे के समर्थन के बिना अपने पारंपरिक मतदाताओं को कितना अपने साथ रख पाते हैं।

कांग्रेस में गठबंधन को लेकर मतभेद

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य के अनुसार, तृणमूल नेतृत्व ने सितंबर की शुरुआत में कांग्रेस आलाकमान से संपर्क कर नंदीग्राम में कांग्रेस और रेजीनगर में तृणमूल को चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि कांग्रेस के राज्य नेताओं ने इसे तृणमूल के साथ गठबंधन का उचित समय नहीं माना और बाद में दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया।

कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि तृणमूल के साथ गठबंधन से पार्टी के संगठन को और नुकसान हो सकता है। उनका आरोप है कि तृणमूल के 15 वर्ष के शासन के दौरान कांग्रेस के कई विधायक उसके साथ चले गए, जिससे राज्य में कांग्रेस का आधार कमजोर हुआ।

वहीं, कांग्रेस के दूसरे धड़े का तर्क है कि जिन क्षेत्रों में दोनों दलों का मतदाता आधार मिलता है, वहां रणनीतिक सहयोग से भाजपा-विरोधी और अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट किया जा सकता है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सवाल स्थायी गठबंधन का नहीं, बल्कि ऐसे क्षेत्रों में रणनीतिक सहयोग की संभावना का है जहां इससे चुनावी लाभ मिल सकता है।

रेजीनगर का मुकाबला ममता गुट के लिए भी महत्वपूर्ण है। उसके एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, नतीजे बताएंगे कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद के बावजूद उसके समर्थक उसके साथ कितने मजबूती से खड़े हैं।

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती के मुताबिक, उपचुनाव के नतीजे किसी सीधे कारण-प्रभाव संबंध को साबित नहीं करेंगे, लेकिन कांग्रेस और तृणमूल के भीतर गठबंधन को लेकर चल रही बहस को प्रभावित कर सकते हैं।

छह अक्टूबर को मतदान और नौ अक्टूबर को मतगणना के बाद दोनों दलों के बीच भविष्य के राजनीतिक समीकरण को लेकर तस्वीर कुछ हद तक स्पष्ट होने की उम्मीद है।