विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कोलकाता दुर्गापूजा: चलताबगान के पंडाल में दिखेगी 'गोदना' की कहानी, आस्था व संघर्ष से रूबरू होंगे श्रद्धालु

Published: Sat, 26 Sep 2026 09:48 PM (IST)

मानिकतल्ला चलताबगान लोहापट्टी दुर्गापूजा कमेटी इस बार 'निशान' थीम पर गोदना (टैटू) की सदियों पुरानी परंपरा को दर्शाएगी। यह पंडाल ...और पढ़ें

मानिकतल्ला चलताबगान के पंडाल में दिखेगी 'गोदना' की सदियों पुरानी कहानी

मानिकतल्ला चलताबगान के पंडाल में दिखेगी 'गोदना' की सदियों पुरानी कहानी

HighLights

  1. मानिकतल्ला दुर्गापूजा पंडाल की थीम 'निशान' गोदना परंपरा पर आधारित।

  2. गोदना आस्था, पहचान, सुरक्षा और सामाजिक संघर्ष का प्रतीक है।

  3. रामनामी समुदाय ने शरीर पर 'राम नाम' गुदवाकर सामाजिक प्रतिरोध किया।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता । मानिकतल्ला चलताबगान लोहापट्टी दुर्गापूजा कमेटी के पंडाल में इस बार शरीर पर बने एक छोटे से निशान के पीछे छिपी सदियों पुरानी कहानी देखने को मिलेगी। पूजा कमेटी से जुड़े अशोक जायसवाल ने बताया-‘इस बार हमारी पूजा की थीम निशान है। इसके जरिए हम गोदना (टैटू) की बहुरंगी परंपरा को पेश करने जा रहे हैं।

गोदना केवल शरीर पर उकेरी गई आकृति नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, पहचान, सुरक्षा, सामाजिक संघर्ष और लोक संस्कृति का निशान है।

आदिवासी व ग्रामीण समुदायों में इसका इतिहास काफी पुराना है। जब श्रृंगार के लिए कपड़े या गहने हर किसी की पहुंच में नहीं थे, तब शरीर पर उकेरा गया निशान ही उनका स्थायी आभूषण बनता था।

बैगा समुदाय में गोदना को ऐसी संपत्ति के रूप में देखा गया, जिसे कोई नहीं छीन सकता था। दर्द से गुजरकर शरीर पर बनाया गया यह निशान धीरे-धीरे व्यक्ति की पहचान का हिस्सा बन जाता है।

WhatsApp Image 2026-09-26 at 21.29.55

महिलाओं के लिए तो यह ऐसा आभूषण रहा है, जिसे आर्थिक अभाव भी उनसे नहीं छीन सकता। मृत्यु के बाद भी इस निशान के साथ रहने की लोकमान्यता ने इसे जीवन और परलोक के बीच एक प्रतीकात्मक कड़ी बना दिया।

जब शरीर बना प्रतिरोध का माध्यम

अशोक जायसवाल ने आगे कहा-‘कई समुदायों में गोदना सामाजिक प्रतिरोध की भाषा भी बना। छत्तीसगढ़ के छरपोरा गांव में दलित समुदायों को लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव के कारण धार्मिक स्थलों में प्रवेश से वंचित रखा गया।

सन् 1890 में राम भजन परशुराम भारद्वाज ने रामनामी समुदाय की स्थापना की। इस समुदाय के लोगों ने अपने शरीर और यहां तक कि चेहरे पर भी ‘राम नाम’ गुदवाना शुरू किया।

मंदिर के दरवाजे बंद हुए तो शरीर ही राम का मंदिर बन गया। शरीर पर लिखा राम नाम धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक पहचान और प्रतिरोध का भी प्रतीक बना। कई समुदायों में गोदना को पवित्रता और सुरक्षा से भी जोड़ा गया है।

मान्यता है कि शरीर पर विशेष निशान होने से बुरी शक्तियों, भूत-प्रेत और बुरी नजर से बचाव होता है। कुछ समुदायों में गोदना को चिकित्सा से जोड़कर भी देखा जाता है।

झारखंड के लातेहार जिले के चिपाधार गांव की 65 वर्षीया गुहामनी देवी ‘जहर उल्की’ नामक गोदने के लिए जानी जाती हैं। स्थानीय विश्वास के अनुसार इस तरह का गोदना गले के दर्द, माइग्रेन, घुटने के दर्द और दूसरी तकलीफों में राहत देता है।

वैज्ञानिक चिकित्सा से इतर यह लोक विश्वास बताता है कि गोदना कई समुदायों में शरीर, बीमारी और आरोग्य की अपनी पारंपरिक समझ का भी हिस्सा रहा है।’

प्रकृति से देवी तक का संबंध

गोदने में बनी प्राकृतिक और ज्यामितीय आकृतियों को कई जगह उर्वरता और प्रकृति की शक्ति से जोड़ा गया है। यही कड़ी दुर्गापूजा की परंपरा तक पहुंचती है। नवपत्रिका में नौ पौधों की पूजा होती है, जिन्हें देवी के अलग-अलग रूपों का प्रतीक माना जाता है।

दक्षिण भारत में प्रचलित कुछ विशेष गोदना आकृतियों और उनसे जुड़ीं जादुई तथा लोक मान्यताओं को भी पंडाल में दिखाई जाने वालीं कहानियों में जगह मिलेगी।