नए नाम-निशान से ममता गुट लड़ेगा निकाय चुनाव? सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बढ़ी मुश्किलें
ममता गुट को आगामी नगर निकाय चुनाव नए पार्टी नाम व निशान के साथ लड़ने पड़ सकते हैं, क्योंकि सुप्रीम ...और पढ़ें
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सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल नाम-निशान विवाद पर फैसला देने को कहा
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल नाम-निशान विवाद पर फैसला देने को कहा।
ममता गुट को निकाय चुनाव में नया प्रतीक चिन्ह मिल सकता है।
चुनाव आयोग को तीन महीने में अंतिम निर्णय लेना होगा।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। आगामी छह अक्टूबर को बंगाल की रेजीनगर व नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव के बाद ममता तृणमूल को आगामी नगर निकाय चुनाव भी नए पार्टी नाम व निशान के साथ लड़ना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह साफ हो गया है कि तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और जोड़ा फूल के निशान को लेकर चल रहे विवाद का निपटारा तत्काल नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने गत सोमवार को चुनाव आयोग को तृणमूल के दोनों गुटों (ममता व ऋतब्रत बनर्जी) की दलील और दस्तावेज जमा होने के बाद तीन महीने में अंतिम फैसला लेने का आदेश दिया है। दोनों पक्षों को अपनी बात रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है यानी पूरी प्रक्रिया में करीब चार महीने लगेंगे।
इस समय सीमा के कारण यदि नवंबर में नगर निकाय के चुनाव होते हैं तो ममता गुट को फिर नए नाम-निशान के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। मालूम हो कि ममता गुट ने तृणमूल के नाम और निशान को लेकर चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। आयोग ने गत 17 सितंबर को अंतरिम व्यवस्था के तहत अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का नाम और जोड़ा फूल निशान रोक दिया था।
रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव के लिए ममता गुट को फुटबालर और ऋतब्रत गुट को लिफाफा निशान दिया गया था। गत सोमवार को ममता गुट की ओर से पार्टी के बागी विधायकों की सदस्यता खत्म करने की याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 विधायकों के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत सदस्यता खत्म करने की मांग की गई थी।
ममता गुट ने आरोप लगाया था कि इन विधायकों के खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लंबे समय से कोई निर्णय नहीं लिया गया है। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के लिए अलग से नई समय सीमा तय नहीं की। अदालत ने 2020 के अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास है और उन्हें उचित समय दिया जाना चाहिए।
