कोलकाता, राज्य ब्यूरो। बंगाल में वामपंथी दल माकपा ने वाममोर्चा का गठन कर लगातार 34 वर्षों तक शासन किया लेकिन 2011 से शुरू हार का सिलसिला अभी भी जारी है। कभी बंगाल में राज करने वाले वामपंथी दलों का अब राज्य से न तो कोई लोकसभा सदस्य है और न ही विधानसभा में ही कोई प्रतिनिधि है। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दल पूरी तरह से हाशिए पर चले गए थे और भाजपा मुख्य विरोधी दल के रूप में उभरी लेकिन नगर निकायों के चुनाव से वाममोर्चा ने वापसी की कोशिश शुरू की है। नगरपालिकाओं के चुनाव में माकपा ने कई वार्डों में भाजपा को पीछे धकेल कर दूसरा स्थान हासिल किया और अब वामपंथी दलों ने पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को शिकस्त देने की रणनीति तैयार की है। वामपंथियों ने हाल में हुए कई विधानसभा उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है। बंगाल की राजनीति में खोई जमीन वापस पाने के लिए उन्हें पंचायत चुनाव में सफलता हासिल कर संगठन की ताकत बढ़ानी होगी। माकपा ने पंचायत चुनाव को लेकर तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी के 24 उत्तर जिले के नेताओं के साथ राज्य और केंद्रीय स्तर के माकपा नेताओं ने बैठक की। पंचायत चुनाव में पार्टी नेताओं की क्या भूमिका होगी, उम्मीदवारों के चयन में कौन से अहम मुद्दे होंगे, राज्य नेतृत्व ने इसका खाका तैयार कर लिया है। पंचायत चुनाव से पहले कई कार्यक्रम चलाए जाएंगे। पंचायत चुनाव में पार्टी के युवाओं की क्या भूमिका होगी, इसे लेकर माकपा के पोलितब्यूरो सदस्य सूर्यकांत मिश्रा 23 जुलाई को कोलकाता के मौलाली युवा केंद्र में बैठक करेंगे। इसी तरह की बैठक उत्तर बंगाल के लिए 31 जुलाई को न्यू जलपाईगुड़ी में होगी। माकपा राज्य नेतृत्व में बदलाव कर चुकी है। पोलितब्यूरो सदस्य और पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम को राज्य सचिव बनाया गया है।

विधानसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी माकपा

बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में विधानसभा की 163 सीटें हैं, जिनमें से तृणमूल को 2021 के विधानसभा चुनाव में 126 पर जीत मिली थी जबकि भाजपा ने 36 सीटों पर कब्जा जमाया है। आइएसएफ को एक सीट मिली है। माकपा इतनी दयनीय स्थिति में थी कि सिर्फ दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। मुर्शिदाबाद जिले की भगवानगोला और जलंगी में माकपा दूसरे नंबर पर रही थी. नतीजतन वर्तमान परिस्थिति में उन ग्रामीण इलाकों में भाजपा को पीछे धकेल कर आगे बढऩा होगा इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य चुनौती संगठनात्मक कमजोरी को दूर करना है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में तृणमूल सरकार की विभिन्न परियोजनाओं से प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए परिवारों को अपनी तरफ खींचना मुश्किल काम है। तृणमूल नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से वामपंथी दल अपनी सियासी जमीन तैयार कर रहे हैं। माकपा ने तृणमूल के साथ-साथ भाजपा पर एक साथ हमला बोलने की रणनीति बनाई है। वह केंद्र सरकार की आर्थिक नीति और सांप्रदायिकता को निशाना बना रही है। दूसरी तरफ राज्य सरकार के खिलाफ कानून व्यवस्था, भाजपा के साथ सांठगांठ और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठा रही है।

Edited By: Sumita Jaiswal