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कोलकाता की इस दुर्गापूजा में नहीं देख सकते बलि, कभी दर्शन करने आती थीं नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मां

By Indrajit SinghEdited By: Naveen Kumar
Published: Sat, 19 Sep 2026 04:27 PM (IST)

कोलकाता की निमतला स्ट्रीट स्थित हाटखोला दत्तबाड़ी की दुर्गापूजा करीब 250 साल पुरानी है, जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मां प्रभावती देवी भी शामिल होती थीं।

हाटखोला दत्तबाड़ी की दुर्गापूजा(फोटो: सोशल मीडिया)

हाटखोला दत्तबाड़ी की दुर्गापूजा(फोटो: सोशल मीडिया)

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इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। उत्तर कोलकाता की निमतला स्ट्रीट स्थित हाटखोला दत्तबाड़ी की दुर्गापूजा करीब ढाई सौ साल पुरानी परंपरा समेटे हुए है। इस पूजा में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मां प्रभावती देवी भी शामिल होती थीं। पूजा की एक खास परंपरा यह है कि नवमी पर होने वाली बलि को परिवार का कोई सदस्य नहीं देख सकता। बलि के स्थान को कपड़े से ढक दिया जाता है।

हाटखोला दत्तबाड़ी में दुर्गापूजा की शुरुआत 1794 में ईस्ट इंडिया कंपनी की पटना शाखा के दीवान जगराम दत्त ने की थी। वह गोविंदशरण दत्त के वंशज थे। गोविंदशरण ने 1780 में गोविंदपुर छोड़कर हाटखोला में निवास बनाया था। बाद में जगराम दत्त ने 78 निमतला घाट स्ट्रीट में प्रासाद जैसा भवन और ठाकुरदलान बनवाकर वहां पूजा शुरू की।

देवी दुर्गा को देशमाता के रूप में देखता था परिवार

स्वदेशी आंदोलन के दौर में परिवार देवी दुर्गा को देशमाता के रूप में देखता था। परिवार के एक पूर्वज ने प्रतिमा विसर्जन के बाद द्विजेंद्रलाल राय का गीत ‘बंग आमार जननी आमार’ गाते हुए घर लौटने की परंपरा शुरू की थी। यह परंपरा आज भी जारी है और विसर्जन के बाद परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से यह गीत गाते हुए घर लौटते हैं।

दत्तबाड़ी का दो दालान और पांच खंभों वाला ठाकुरदलान अपनी स्थापत्य शैली के लिए भी खास है। परिवार के अनुसार इसे काशी, द्वारका समेत देश के विभिन्न तीर्थस्थलों से लाई गई मिट्टी से बनाया गया था। पूजा में अन्नभोग नहीं चढ़ाया जाता।

मिठाई और विभिन्न प्रकार के तले हुए व्यंजन भोग में शामिल होते हैं, जबकि आलू का इस्तेमाल नहीं होता। भोग सजाने से लेकर पूजा के अन्य कार्य ब्राह्मण ही करते हैं। नवमी पर खोए (मावा) की गुड़िया की बलि की परंपरा है, लेकिन परिवार के सदस्यों को इसे देखने की अनुमति नहीं है।

प्रतिमा में पारंपरिक बंगाल शैली की विशेषताएं

प्रतिमा में भी पारंपरिक बंगाल शैली की विशेषताएं हैं। चमकीली सजावटी सामग्री से प्रतिमा का श्रृंगार, घोड़े के आकार का सिंह इसकी पहचान हैं।

मिट्टी की सजावट में कृष्णलीला और चंडी की कथाओं को उकेरा गया है। समय के साथ भव्यता भले कम हुई हो, लेकिन दत्तबाड़ी की पूजा की पुरानी परंपराएं आज भी कायम हैं।