कोलकाता: हिंदुस्तान पार्क की अनोखी थीम, दुर्गापूजा पंडाल में दिखाएगा माचिस की रोशनी के पीछे छिपा बचपन का खौफनाक सच
हिंदुस्तान पार्क सार्वजनीन दुर्गोत्सव कमेटी इस बार दुर्गापूजा में माचिस कारखानों में बाल श्रम और बच्चों के शोषण की भयावह कहानी को अपनी थीम बनाएगी।

कोलकाता दुर्गापूजा में हिंदुस्तान पार्क बना रहा अनूठा पंडाल

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विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता । दुर्गापूजा की चकाचौंध के बीच हिंदुस्तान पार्क सार्वजनीन दुर्गोत्सव कमेटी इस बार उस अंधेरे की कहानी सामने रखेगी, जिसे सभ्यता की रोशनी ने लंबे समय तक ढककर रखा।
96वें वर्ष की पूजा प्रस्तुति में माचिस कारखानों में बाल श्रम, जहरीले रसायनों के बीच बच्चों का शोषण, उनके स्वास्थ्य पर पड़ा भयावह असर और फिर उस अमानवीय व्यवस्था से मुक्ति की यात्रा दिखाई जाएगी।
पंडाल के जरिए बताया जाएगा कि जिस छोटी सी माचिस की तीली ने घरों और कारखानों को रोशन किया, उसके पीछे कभी हजारों बच्चों का बचपन, स्वास्थ्य और भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया था।

कमेटी की सचिव सुतपा दास ने बताया कि करीब एक शताब्दी पहले माचिस कारखानों में बड़ी संख्या में बच्चे बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते थे। माचिस बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले जहरीले फास्फोरस के संपर्क में आने से श्रमिकों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
कारखानों के बंद और प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक काम करने वाले बच्चों के लिए यह खतरा और भी गंभीर था। पंडाल में इन्हीं परिस्थितियों को मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत किया जाएगा।
जहरीले फास्फोरस से गलने लगती थी जबड़े की हड्डी
माचिस कारखानों के इतिहास की सबसे भयावह औद्योगिक बीमारियों में से एक थी ‘फॉसी जॉ’। सफेद फास्फोरस के धुएं और संपर्क के कारण होने वाली इस बीमारी में जबड़े की हड्डी में गंभीर क्षति पहुंचती थी और ऊतक नष्ट हो जाते थे।

दांत और मसूड़ों में दर्द तथा सूजन से शुरू होने वाली बीमारी आगे चलकर जबड़े की हड्डी के गलने और चेहरे को विकृत कर देने वाली भयावह स्थिति तक पहुंच जाती थी। गंभीर मामलों में संक्रमण जानलेवा साबित होता था। ऐतिहासिक अभिलेखों में माचिस कारखानों के बच्चों, किशोरों और महिलाओं के इस बीमारी की चपेट में आने का उल्लेख मिलता है।
अंधेरे में जली थी प्रतिरोध की लौ
सुतपा ने बताया कि थीम केवल त्रासदी तक सीमित नहीं रहेगी। इसमें उस प्रतिरोध और सामाजिक बदलाव की कहानी भी दिखाई जाएगी, जिसने बाल श्रम और अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। मजदूर आंदोलनों, सामाजिक सुधार के प्रयासों और बाद में कानूनी हस्तक्षेपों ने खतरनाक औद्योगिक परिस्थितियों में बदलाव का रास्ता तैयार किया।
माचिस कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के आंदोलनों ने भी इस मुद्दे को सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाने में भूमिका निभाई। सन् 1888 का लंदन ‘मैचगर्ल्स’ आंदोलन इसका चर्चित उदाहरण है।
सफेद फास्फोरस के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान के खिलाफ लंबे समय तक अभियान और नियमों की मांग उठती रही। बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफेद फास्फोरस वाले माचिस के उत्पादन पर रोक की दिशा में कदम उठे और सुरक्षित विकल्पों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिला। इस बदलाव ने उस औद्योगिक बीमारी के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
देवी दुर्गा होंगी आश्रय और सुरक्षा की प्रतीक
हिंदुस्तान पार्क के पंडाल में देवी दुर्गा को केवल आराध्य के रूप में नहीं, बल्कि आश्रय, सुरक्षा और संरक्षण की प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा। गणेश, लक्ष्मी, कार्तिक और सरस्वती की उपस्थिति भी इसी भाव को आगे बढ़ाएगी। देवी के सान्निध्य में बच्चों को भय और शोषण के अंधेरे से निकालकर सुरक्षा और उम्मीद की रोशनी की ओर बढ़ते हुए दिखाया जाएगा।
