संस्कार की धरा पर नवाचार से सशक्त होती संस्कृति
कोलकाता की दुर्गा पूजा नवाचार और परंपरा का अद्भुत संगम है, जहां पंडालों से लेकर प्रतिमाओं तक में प्रयोगधर्मिता दिखती है।

विश्वरूपा विश्वरूपिणी थीम पर सजा कोलकता का चेतला अग्रणी दुर्गा पूजा पंडाल।
HighLights
कोलकाता दुर्गा पूजा में नवाचार और परंपरा का अद्भुत मेल।
पंडालों में दिखती है प्रयोगधर्मिता और सनातन संस्कृति का प्रभाव।
उत्सव में संस्कार, मर्यादा और सहयोग की भावना प्रमुख।
अनंत विजय, कोलकाता। दुर्गा पूजा और पंडाल कोलकाता की उत्सवी संस्कृति का वो हिस्सा है, जिसको हर भारतीय को एक बार महसूस करना चाहिए। नवरात्र के दौरान कोलकाता में देवी दुर्गा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक का उत्सव भारतीय संस्कृति के उस आयाम को उद्घाटित करता है जहां संस्कार हैं, मर्यादा है, नवाचार है, सहयोग से समन्वय का सोच है।
देवी दुर्गा की मूर्ति से लेकर पंडाल तक में प्रयोगधर्मिता है। ऐसी प्रयोगधर्मिता जो जन के मन से जुड़कर उनके संस्कार को झंकृत करती है। कोलकाता की दुर्गा पूजा के उत्सव में प्रयोगधर्मिता पंडाल के डिजाइन से लेकर मां की प्रतिमा निर्मित करने और वस्त्रों तक में दिख रही है। प्रयोग के नाम पर संस्कार को खंडित नहीं किया गया है।
महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा में पौराणिक आख्यानों में वर्णित सारे प्रतिमान दिखते हैं। महिषासुर वध भी है, माता की भुजाओं में अस्त्र और कमल का फूल है, लेकिन किसी प्रतिमा में वो एक भुजा में गणेशजी को उठाए भी हैं। उनके पांवों के नीचे महिषासुर है ही।

यह प्रयोगधर्मिता सनातन के संस्कारों से निर्मित होती है और इस वर्ष कोलकाता के पंडालों में दिख रही है। कहीं वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने की थीम, कहीं राम की अयोध्या, कहीं महाभारत तो कहीं देवी दुर्गा की ब्रह्मांडीय शक्ति को बताती विश्वरूपा-विश्वरूपिणी का विराट स्वरूप।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दुर्गा पूजा पर पूरा कोलकाता नवरात्र में विशेषकर पांच दिनों तक भक्ति में सराबोर है, परंतु किसी भी पंडाल में आपको कानफोड़ू संगीत नहीं सुनाई देगा। डीजे पर बजने वाला फिल्मी संगीत भी अनुपस्थित है।
इन पांच दिनों के दौरान जो संस्कृति आकार लेती है उसमें ढाक के स्वर, रवींद्र संगीत की कर्णप्रिय धुनें और देवी मां की प्रतिमा के आगे ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती महिलाएं। यह नृत्य मां दुर्गा के भक्तों में उल्लास भरता है।
पंडाल और उसके आसपास खाने-पीने की वस्तुएं बिकती हैं। वहां भी विशेष प्रकार की सुरुचि संपन्नता दिखती है। दुर्गा जी की प्रतिमा लगभग सभी मुहल्लों में स्थापित होती है, लेकिन कहीं कोई शोर नहीं। अफरातफरी नहीं। आत्मनियंत्रण और एक-दूसरे के साथ सहयोग करते लोग। पंडालों के बीच कोई द्वंद्व नहीं, बल्कि संयोग और सहयोग का समन्वय दिखता है, जो बंगाल की सांस्कृतिक विरासत की अमिट छाप छोड़ता है।
इस बार कोलकाता के विभिन्न दुर्गा पंडालों में सनातनी संस्कृति को लेकर एक विशेष आकर्षण दिखता है। जिस भूमि पर जय श्रीराम कहने पर सत्ताधारियों की भृकुटि तन जाती थी, वहां अब पंडालों के बाहर राम-राम लिखा है। छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय के लोग भजन गा रहे हैं। परिवर्तन ने बंगाल में सनातन के सातत्य को बल प्रदान किया है।
