‘डाकू के गांव’ से ‘डॉक्टर का गांव’: नीट पास कर कलिमुल्लाह ने बदली बंगाल के मुख्यापाड़ा की पहचान
कलिमुल्लाह मंडल ने नीट परीक्षा पास कर एमबीबीएस में दाखिला लिया है, जिससे बांकुड़ा के मुख्यापाड़ा गांव की पहचान 'डाकू के गांव' से 'डॉक्टर के गांव' में बदल रही है।

नीट पास कर कलिमुल्लाह ने बदली बंगाल के मुख्यापाड़ा की पहचान।
HighLights
कलिमुल्लाह मंडल ने नीट परीक्षा में सफलता हासिल की।
बांकुड़ा का मुख्यापाड़ा गांव अब 'डॉक्टर का गांव' कहलाएगा।
कलिमुल्लाह गरीबों का मुफ्त इलाज करने का संकल्प लिया।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। कभी जिस गांव की पहचान डकैती की घटनाओं से जुड़ी थी, अब उसी गांव के लोग उसकी नई पहचान का सपना देख रहे हैं। वर्षों तक ‘डाकू के गांव’ के नाम से बदनाम बांकुड़ा के ओंदा ब्लॉक के पुलिसोल के मुख्यापाड़ा में अब उम्मीद की एक नई कहानी लिखी जा रही है।
इस बदलाव के केंद्र में हैं इसी गांव के कलिमुल्लाह मंडल, जिन्होंने नीट में सफलता हासिल कर एमबीबीएस में दाखिला लिया है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब उनके गांव को ‘डाकू के गांव’ नहीं, बल्कि ‘डॉक्टर के गांव’ के रूप में जाना जाएगा।
मुख्यापाड़ा निवासी कलिमुल्लाह बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रहे हैं। नीट में सफलता के बाद उन्होंने बांकुड़ा सम्मिलनी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। राज्य स्तर पर उन्होंने करीब आठ हजार की रैंक हासिल की है। साधारण परिवार से आने वाले कलिमुल्लाह की इस उपलब्धि से उनके माता-पिता के साथ पूरा गांव उत्साहित है।
गरीबों का मुफ्त इलाज करने का संकल्प
कलिमुल्लाह के पिता बू अली मंडल एग्री मैकेनिकल विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, जबकि मां ममिना मंडल गृहिणी हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद बेटे ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। बांकुड़ा के बंग विद्यालय से उन्होंने 440 अंक हासिल कर उच्च माध्यमिक परीक्षा पास की। इसके बाद ऑनलाइन माध्यम से नीट की तैयारी की और सफलता हासिल की।
कलिमुल्लाह कहते हैं कि डॉक्टर बनने के बाद उनका पहला लक्ष्य अपने गांव के गरीब और जरूरतमंद लोगों की सेवा करना है। वह उनका मुफ्त इलाज करना चाहते हैं। साथ ही, अपनी तरह संसाधनों की कमी से जूझ रहे विद्यार्थियों के लिए भी कुछ करना चाहते हैं।
उनका कहना है कि उन्होंने खुद ऑनलाइन पढ़ाई के जरिए नीट की तैयारी की है, इसलिए अवसर के अभाव में किसी प्रतिभाशाली छात्र-छात्रा की पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए। भविष्य में वह ऐसे विद्यार्थियों को नीट की तैयारी में मदद करना चाहते हैं।
‘डाकू के गांव’ से ‘डॉक्टर के गांव’ की ओर
ग्रामीणों के मुताबिक, गांव के कई लोगों ने पहले सरकारी नौकरियां हासिल की हैं, लेकिन पहली बार यहां से कोई युवक डॉक्टर बनने की राह पर बढ़ा है। कलिमुल्लाह की सफलता ने पूरे इलाके को गौरवान्वित किया है और पुरानी बदनामी से बाहर निकलने की उम्मीद भी जगाई है।
स्थानीय निवासी अबू बक्कर कहते हैं कि गांव की पहचान बदल रही है। जिस इलाके को कभी ‘डाकू के गांव’ के नाम से जाना जाता था, अब वहां से डाक्टर निकलने वाला है। उनके मुताबिक, कलिमुल्लाह की सफलता गांव के बच्चों के लिए भी नई प्रेरणा बनेगी।
