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जोधपुर पार्क दुर्गा पूजा के 75 साल, इस बार की थीम 'गुप्तायन'; क्या है इसका मतलब?

Published: Tue, 29 Sep 2026 06:45 PM (IST)

जोधपुर पार्क शारदीया उत्सव समिति अपने 75वें वर्ष में 'गुप्तायन' थीम के साथ दुर्गा पूजा मना रही है।

जोधपुर पार्क शारदीया उत्सव समिति का 75वां दुर्गा पूजा

जोधपुर पार्क शारदीया उत्सव समिति का 75वां दुर्गा पूजा

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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। धन-दौलत और सत्ता के पीछे भागती दुनिया में आखिर असली खजाना कहां छिपा है? क्या वह किसी संदूक में बंद है, जमीन के नीचे दबा है या फिर किसी पुराने राजमहल की दीवारों के पीछे छिपा है? जोधपुर पार्क शारदीया उत्सव समिति ने दुर्गा आराधना के अपने 75वें वर्ष में इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है।

पूजा कमेटी के महासचिव सुमंत राय ने बताया-हमारी इस बार की थीम ‘गुप्तायन’ (छिपे हुए खजाने की खोज की यात्रा) है, जो बाहरी संपदा के बजाय हमारे अंदर छिपी रचनात्मकता और हमारी सांस्कृतिक जड़ों में छिपे उस अमूल्य खजाने की तलाश की कहानी कहती है।

आधुनिक समाज में समृद्धि को अक्सर धन, भौतिक संसाधनों और बाहरी वैभव से जोड़कर देखा जाता है। मनुष्य अधिक पाने को दौड़ता रहता है, लेकिन इसी दौड़ में उसके आसपास मौजूद कई अनमोल चीजें पीछे छूट जाती हैं।

'गुप्तायन' थीम आंतरिक रचनात्मकता पर केंद्रित

संस्कृति, लोक कला, पारंपरिक ज्ञान, शिल्प, विरासत, रिश्तों की गरमाहट और मानवीय संवेदनाएं ऐसे ही खजाने हैं। इनका कोई बाजार मूल्य नहीं है लेकिन इनके बिना समाज की पहचान अधूरी है। हमारे इस वर्ष की प्रस्तुति मनुष्य के अंदर छिपी इसी संपदा को सामने लाने का प्रयास है।

यहां गुप्तधन किसी भौतिक वस्तु का प्रतीक नहीं बल्कि उन मूल्यों का रूपक है, जो पीढ़ियों से मनुष्य के साथ चलते आए हैं।

मिट्टी से आकार लेती मूर्ति, कलाकार के हाथों की सृजनशीलता, पीढ़ियों से आगे बढ़ता ज्ञान, लोक परंपराओं में सुरक्षित स्मृतियां और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना, इन सबको इस थीम में उस खजाने के रूप में दिखाया जाएगा, जिसे खोजने के लिए बाहर नहीं, अपने अंदर उतरना पड़ता है।

समाज की असली पहचान उसकी स्मृतियों और विरासत में

सुमंत राय ने आगे कहा-थीम का एक महत्वपूर्ण पक्ष अपनी जड़ों से जुड़ाव भी है। समय बदलता है, तकनीक बदलती है और जीवनशैली बदलती है, लेकिन किसी समाज की असली पहचान उसकी स्मृतियों और विरासत में सुरक्षित रहती है।

नई पीढ़ी आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए जब अपनी परंपराओं से दूर होने लगती है, तब ‘गुप्तायन’ उसे अपनी जड़ों की ओर देखने का अवसर देता है।

सवाल यह है कि जिसे हम पुराना समझकर पीछे छोड़ रहे हैं, कहीं वही तो हमारी सबसे बड़ी पूंजी नहीं है? हमारी थीम इस विचार को अभिव्यक्त करती है।

दुर्गा की आराधना में केवल असुर पर देवी की विजय का भाव नहीं है, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संदेश भी है। इसी भाव को ‘गुप्तायन’ मनुष्य के भीतर के अंधेरे और उजाले से जोड़ता है।

बाहरी बुराइयों के विनाश के साथ भीतर छिपी अच्छाई, संवेदना, सृजनशीलता और साहस को जागृत करना भी जरूरी है।

मिट्टी का भी थीम में खास अर्थ

मिट्टी भी इस थीम में खास अर्थ रखती है। जिस मिट्टी से देवी की प्रतिमा आकार लेती है, वही मिट्टी मनुष्य को उसकी जड़ों की याद दिलाती है। कलाकार के हाथ जब उसी मिट्टी को देवी के रूप में ढालते हैं, तो उसमें केवल शिल्प नहीं, बल्कि परंपरा, श्रम और आस्था भी आकार लेते हैं।

एक साधारण मिट्टी का ढेर सृजन की प्रक्रिया से गुजरकर ऐसा रूप लेता है, जिसके सामने लाखों लोग श्रद्धा से सिर झुकाते हैं। यही परिवर्तन ‘गुप्तायन’ के मूल विचार को मजबूत करता है। सुमंत राय ने कहा कि 75वें वर्ष की यह थीम इसलिए भी खास है कि खुद जोधपुर पार्क शारदीया उत्सव की लंबी यात्रा एक तरह की सांस्कृतिक विरासत है।