डायनासोर युग के दुर्लभ जीव को मिलेगा नया आशियाना, दार्जिलिंग की पहाड़ियों में बनेगी सैंक्चुरी
दार्जिलिंग पहाड़ियों में दुर्लभ हिमालयन सैलामैंडर को विलुप्त होने से बचाने के लिए दुनिया का पहला सैंक्चुरी विकसित किया जा रहा है।

दार्जिलिंग पहाड़ियों में हिमालयन सैलामैंडर सैंक्चुरी विकसित हो रहा है
HighLights
दार्जिलिंग पहाड़ियों में हिमालयन सैलामैंडर सैंक्चुरी विकसित हो रहा है
बिखरे हुए प्रजनन स्थलों को जोड़कर व्यापक संरक्षण किया जाएगा
स्थानीय समुदाय और चाय बागान प्रबंधन भी इसमें शामिल होंगे
जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी। डायनासोर के जमाने से अस्तित्व में रही दुर्लभ हिमालयन सैलामैंडर प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने के लिए बंगाल में दार्जिलिंग पहाड़ियों में दुनिया का पहला हिमालयन सैलामैंडर सैंक्चुरी विकसित करने की तैयारी चल रही है।
संवेदनशील उभयचर प्रजाति को सुरक्षित प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराने के लिए राज्य वन विभाग, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के स्तर पर प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। कार्सियांग वन विभाग की ओर से तैयार विस्तृत प्रस्ताव और अध्ययन रिपोर्ट केंद्र सरकार तथा सेंट्रल जू अथारिटी को भेजी जा चुकी है।
हिमालयन सैलामैंडर के लिए बनेगी सैंक्चुरी
प्रस्तावित सैंक्चुरी की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इसका क्षेत्र किसी एक बड़े जंगल तक सीमित नहीं रहेगा। हिमालयन सैलामैंडर के प्राकृतिक प्रजनन स्थल पहाड़ी क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर छोटे जलाशयों, पोखरियों और नम इलाकों के रूप में फैले हुए हैं।
इन्हीं बिखरे हुए महत्वपूर्ण आवासों को चिन्हित कर एक समग्र संरक्षण क्षेत्र विकसित करने की योजना है। इसके लिए नामथिंग पोखरी, पोखरियाटार और पंच पोखरी को प्रमुख केंद्र बनाया गया है।
वन विभाग के अनुसार नामथिंग पोखरी को प्रस्तावित सैंक्चुरी के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। फिलहाल यह जिला प्रशासन के अधीन राजस्व भूमि है और इसे वन विभाग को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
पोखरियाटार संरक्षित वन क्षेत्र के भीतर है, जबकि पंच पोखरी जंगल के अंदर मौजूद पांच प्राकृतिक छोटे जलाशयों का समूह है। जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सैंक्चुरी की घोषणा की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है।
सैलामैंडर के प्रजनन क्षेत्र काफी छोटे और अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं। कहीं कुछ एकड़ तो कहीं कुछ हेक्टेयर में इनके प्राकृतिक आवास मौजूद हैं। ऐसे सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों को चिन्हित कर पहले चरण में करीब 12 से 15 एकड़ क्षेत्र को अभयारण्य की कानूनी सुरक्षा के दायरे में लाने की तैयारी है। नामथिंग पोखरी और आसपास के क्षेत्रों के लिए 2026-2031 की प्रबंधन योजना भी तैयार की गई है।
चाय बागानों तक पहुंचेगा संरक्षण तंत्र
सैंक्चुरी की राह में सबसे बड़ी चुनौती उन प्रजनन स्थलों का संरक्षण है, जो संरक्षित वन क्षेत्र से बाहर हैं। कई जलाशय चाय बागानों, आबादी और निजी जमीन के आसपास स्थित हैं। वन विभाग इन क्षेत्रों को भी संरक्षण तंत्र से जोड़ने के लिए भूमि मालिकों और चाय बागान प्रबंधन के साथ समन्वय कर रहा है। मार्गरेट्स होप टी एस्टेट जैसे क्षेत्रों में जलाशयों के आसपास सुरक्षा घेरा बनाने की पहल की जा रही है।
इसके प्राकृतिक प्रजनन स्थल जहां भी हैं, उन्हें संरक्षण तंत्र से जोड़ना जरूरी है। स्थानीय समुदाय, चाय बागान प्रबंधन, शोधकर्ताओं और प्रशासन की भागीदारी से सैंक्चुरी को समुदाय आधारित संरक्षण माडल के रूप में विकसित करने की योजना है।
इसके तहत जलस्रोतों और आसपास के जैव विविधता क्षेत्रों की नियमित निगरानी, प्रजनन स्थलों की मैपिंग और वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाएगा। उद्देश्य केवल सैलामैंडर की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास और उससे जुड़े पहाड़ी जल पारिस्थितिकी तंत्र को भी सुरक्षित रखना है।
