बंगाल में दुर्गा पूजा के रंग: कोलकाता में महिलाओं ने तोड़े बंधन, मालदा में 376 साल से पुरुष पुजारियों का रिवाज
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा परंपरा और आधुनिकता का संगम दिखा, जहां मालदा में 376 साल से पुरुष ही पूजा ...और पढ़ें


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डिजिटल डेस्क, कोलकाता। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का उत्सव केवल आस्था और उल्लास का पर्व नहीं है, बल्कि यह परंपरा और आधुनिक सोच के दिलचस्प संगम का भी गवाह है।
एक तरफ जहां मालदा में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजधानी कोलकाता ने रूढ़ियों को तोड़कर महिला पुजारियों के जरिए एक नए युग की शुरुआत की है।
मालदा में पुरुषों के हाथों में पूरी कमान
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की 'आदि कंस बनिक दुर्गाबाड़ी' अपनी 376 साल पुरानी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां मां दुर्गा की आराधना उनके 'चंडी' रूप में की जाती है। इस पूजा का सबसे अनूठा पहलू यह है कि भोग बनाने से लेकर पूजा और प्रतिमा विसर्जन तक का सारा काम केवल पुरुष सदस्य ही करते हैं।
पूजा की सामग्री तैयार करने वाले 'भोग मंदिर' में महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। आदि कंस बनिक समाज के लगभग 400 परिवार इस रीति का पालन करते हैं और उनका मानना है कि यह नियम महिलाओं को भारी श्रम से दूर रखकर उनके सम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया है।
दुर्गाबाड़ी में परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखने के लिए 8 वर्ष के बालक से लेकर 80 वर्ष तक के बुजुर्ग पुरुष सक्रिय रहते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'मुक्तार' कहा जाता है। आयोजन का पूरा खर्च भी केवल पुरुष ही उठाते हैं, जिसमें विवाहित और अविवाहित पुरुषों के लिए चंदे की राशि अलग-अलग तय होती है।
इस पूजा की एक और विशेषता यह है कि यहां मां को पके हुए अन्न का भोग नहीं लगाया जाता। षष्ठी पर प्रतिमा दर्शन के बाद, सप्तमी को पुरुष सदस्य ढोल-नगाड़ों के साथ घाट जाकर कलश में जल भरते हैं और दशमी के दिन विशेष नियमों के तहत ही विसर्जन संपन्न होता है।
कोलकाता के 66 पल्ली में महिला पुजारियों ने तोड़ी परंपरा
मालदा की सदियों पुरानी इस प्रथा के बिल्कुल उलट, कोलकाता के ऐतिहासिक 66 पल्ली पूजा पंडाल ने एक नई क्रांति की शुरुआत की। साल 2021 में नंदिनी भौमिक और उनके महिला पुरोहित समूह शुभमस्तु ने यहां दुर्गा पूजा के सभी अनुष्ठान खुद संपन्न कराकर इतिहास रचा।
शुरुआत में इस पहल को सामाजिक विरोध और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, क्योंकि पुरोहिताई पर हमेशा से पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। हालांकि, समूह की सदस्य प्रियंका चटर्जी और उनकी टीम ने मंत्रों के गूढ़ अर्थ को आसान भाषा में समझाकर लोगों का दिल जीत लिया और धीरे-धीरे समाज का नजरिया बदलने लगा।
देश-विदेश तक फैली गूंज
आज 'शुभमस्तु' समूह में 16 मुख्य महिला पुजारी हैं। यह टीम अब न केवल कोलकाता के प्रमुख पंडालों में पूजा करा रही है, बल्कि दिल्ली, डेनमार्क और कनाडा जैसी जगहों से आने वाली महिलाओं को भी पुरोहिताई का विधिवत प्रशिक्षण दे रही है। लोगों का विश्वास इस कदर बढ़ा है कि अब आयोजक महीनों पहले इनकी बुकिंग करते हैं।
महिलाओं के पुरोहित बनने की यह गूंज केवल भारत तक सीमित नहीं है। ब्राजील के साओ पाउलो में रत्नाबली अधिकारी पिछले डेढ़ दशक से पूजा करा रही हैं, तो वहीं अमेरिका के साउथ कैरोलिना में शिक्षिका मौमिता चक्रवर्ती भी पुरोहित की भूमिका निभाकर रूढ़िवादी सोच को सशक्त चुनौती दे चुकी हैं।
