जागरण संवाददाता, कोलकाता : खस्ता हाल बाजार में दुर्गा प्रतिमा निर्माण किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन ऐन वक्त पर कोलकाता के मूर्तिकारों को विदेशों से मिली मूर्तियों के ऑर्डर ने मौजूदा समस्या से उबारने का काम किया है। कुम्हारटोली की मूर्तिकार चाइना पाल की मानें तो मिट्टी की अनुपलब्धता व अन्य समानों की आसमान छूती कीमत के बीच मूर्ति निर्माण खासा मुश्किल साबित रहा है, लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें व यहां के अन्य मूर्तिकारों को विदेशों से मिली मूर्तियों के ऑर्डर ने संभालने का काम किया है। चाइना ने बताया कि उन्हें रोमानिया और अमेरिका से दो मूर्तियों के ऑर्डर मिले हैं और इसके अलावा महानगर व आसपास के जिलों के कई थीम मंडपों के लिए भी वे मूर्ति बना रही हैं। वहीं मौजूदा समस्या पर उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की अहमियत अन्य लोगों की तरह ही हम भी बखूबी समझते हैं, लेकिन एकाएक किसी व्यवस्था को भंग कर देना भी सही नहीं है। आए दिन रंगों के इस्तेमाल को लेकर हम पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन जिन रंगों के इस्तेमाल को कहा जा रहा है उसकी कीमत परंपरागत रंगों की तुलना में कहीं अधिक है। ऐसे में इसका असर मूर्तियों की लागत पर पड़ता है और लागत के अनुरुप कीमत न मिले तो काम करना व्यर्थ है। इधर, लक्ष्मण पाल नाम के एक अन्य मूर्तिकार ने कहा कि पिछले वर्ष उन्होंने कुल 33 मूर्तियां बनाई थी, लेकिन इस बार बाजार की स्थिति को देखते हुए महज 20 मूर्तियां बना रहे हैं। वहीं कुम्हारटोली मृतशिल्प संस्कृति समिति के संयुक्त सचिव बाबू पाल ने बताया कि इस बार विदेशों से कुल 64 मूर्तियों के ऑर्डर मिले हैं, जो जर्मनी, रूस, अमेरिका, स्पेन, ब्राजील, आस्ट्रिया, रोमानिया, न्यूजीलैंड और एक ऑर्डर केनिया से मिला है। उन्होंने बताया ये ऑर्डर हर साल नहीं मिलते हैं, क्योंकि यहां से जाने वाली मूर्तियों को विदेशों में कम से कम पांच से छह साल तक इस्तेमाल किया जाता है और विशेष कर उन्हीं देशों से अधिक ऑर्डर मिलते हैं, जहां बंगालियों की आबादी होती है। बाबू ने बताया कि गत वर्ष 45 मूर्तियों के ऑर्डर मिले थे, लेकिन अबकी खुशी की बात यह है कि इस बार संख्या में बढ़ोतरी होने से कई कलाकारों को काम मिला है। विदेशों से मूर्तियों के ऑर्डर पाने वाले कलाकारों में विशेष रूप से कौशिक घोष, प्रशांत पाल, विप्लव पाल, सुजीत पाल, भावेश पाल, सोमेन पाल, चाइना पाल और राजा पाल शामिल हैं। मूर्ति भेजने की व्यवस्था

मूर्तिकार बाबू पाल ने बताया कि हमारा दायित्व केवल मूर्ति निर्माण का होता है और इसके निर्माण के बाद निर्धारित तारीख को मूर्तियों को सौंपने के बाद हमारी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। कई बार विशेष आग्रह पर मूर्तियों को एयरपोर्ट या फिर बंदरगाह तक पहुंचा दिया जाता है, वरना ज्यादातर लोग अपनी व्यवस्था के अनुरुप यहां से मूर्तियां ले जाते हैं।

Posted By: Jagran

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