जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता : आठ वर्ष पहले तक अक्सर माओवादी गतिविधियां और खूनखराबे को लेकर सुॢखयों में रहने वाला बंगाल के जंगलमहल का प्रमुख जिला पश्चिम मेदिनीपुर तृणमूल कांग्रेस का दुर्ग माना जाता है। क्योंकि, जिले की सभी विधानसभा सीटों पर तृणमूल का कब्जा है। इस जिले में जहां विश्व प्रसिद्ध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) खडग़पुर और रेलनगरी है तो दूसरी ओर आदिवासी बहुल इलाके भी हैंं। खडग़पुर सदर विधानसभा सीट पर तेलुगू और हिंदीभाषियों की आबादी 60-65 फीसद के करीब है। यही वजह रही है कि इस सीट से कांग्रेस के दिवंगत नेता ज्ञानसिंह सोहनपाल दस बार चुनाव जीतेे थे। 2016 में उन्हेंं भाजपा प्रत्याशी व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से हार मिली थी।

दिलीप घोष बाद में यहां से सांसद चुने गए। हाल में भाजपा में शामिल सुवेंदु अधिकारी की जंगलमहल में पूरी धाक है। इन दोनों नेताओं ने यहां कमल खिलाने के लिए जंंगलमहल में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जिले में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा तक सभा और रैलियां कर चुके हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी भी सक्रिय हैं। लड़ाई जबर्दस्त है और दिलीप सुवेंदु तृणमूल के दुर्ग में कितनी सेंधमारी कर पाते हैं इसपर सबकी नजर है।   

वर्तमान में 15 सीटों पर तृणमूल का है कब्जा :

पश्चिम मेदिनीपुर जिले में 15 विधानसभा सीटें है। 2016 के चुनाव में 13 सीटोंं पर तृणमूल और एक-एक सीट पर भाजपा और कांग्रेस को जीत मिली थी। बाद में सबंग सीट से चुनाव जीतने वाले कांग्रेस विधायक मानस भुइयां तृणमूल में शामिल हो गए। फिर जब उन्हेंं तृणमूल ने राज्यसभा भेज दिया तो सीट रिक्त हो गई और उपचुनाव में तृणमूल ने भुइयां की पत्नी को मैदान में उतारा और वह जीत गईं। वहीं लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा के दिलीप घोष ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और उपचुनाव हुआ तो यह सीट भी तृणमूल जीत गई। पर, लोकसभा चुनाव में भाजपा इस जिले की 15 में से सात विधानसभा सीटों पर बढ़त बना ली। वर्तमान में हालात और भी जुदा है। नंदीग्राम आंदोलन के पोस्टर ब्वाय और कद्दावर नेता सुवेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। वह जब तृणमूल में थे तो वह पश्चिम मेदिनीपुर जिले के प्रभारी भी थे। जिसकी वजह से उनकी इस जिले पर अच्छी पकड़ है। ममता को खतरा महसूस हो भी गया है। यही वजह है कि उन्होंने यहां नंदीग्राम से चुनाव लडऩे की घोषणा की है। 17 फीसद आदिवासी मतदाताओं को भी लुभाने की कोशिश में सरना धर्मकोड के मुद्दे का भी समर्थन किया है। मुस्लिम वोटर बहुल तीन-चार सीटों पर तो उनका दांव है ही।

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सुशांत घोष के लौटने से माकपा में लौटी है जान : एक समय पश्चिम मेदिनीपुर में माकपा के सबसे कद्दावर व बाहुबली नेेेेता माने जाने वाले सुशांत घोष लगातार 29 वर्षों तक विधायक रहे हैं। वह गड़बेत्ता नरकंकाल कांड में पिछले कई वर्षों से जेल में थे। कुछ माह पहले ही उन्हेंं सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली और वह अपने इलाके में लौट आए हैं। इसके बाद पूरे क्षेत्र में पोस्टर लगाया गया कि टाइगर इज बैक। घोष के लौटने के बाद उम्मीद की जा रही है कि पश्चिम मेदिनीपुर जिले में वाम-कांग्रेस गठबंधन का भी खाता खुल सकता है।

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