कोलकाता भगदड़: चोरबागान के दुर्गा पंडाल में आखिर ऐसा क्या था खास, जिसके लिए उमड़ी थी भारी भीड़
कोलकाता के चोरबागान सार्वजनिन दुर्गोत्सव समिति ने अपनी 91वीं दुर्गापूजा में 'अरब' (ध्वनि से परे) थीम के तहत मां दुर्गा ...और पढ़ें

चोरबागान में आखिर ऐसा क्या था खास कि उमड़ पड़ा था जनसैलाब? (फोटो- PTI)

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राज्य ब्यूरो, कोलकाता । कोलकाता की दुर्गापूजा में हर साल बड़े-बड़े पंडाल अपनी भव्यता, अनूठी कलाकारी और अलग-अलग विषयों के कारण लोगों को आकर्षित करते हैं। लेकिन उत्तर कोलकाता के चोरबागान सार्वजनिन दुर्गोत्सव समिति ने इस बार जिस विचार को केंद्र में रखा, वह चकाचौंध और शोर-शराबे से बिल्कुल अलग था।
यहां मां दुर्गा को पारंपरिक युद्धरत मुद्रा में नहीं, बल्कि ध्यान में लीन दिखाया गया। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर महिषासुर का संहार करने वाली परिचित छवि के बजाय शांति और आत्मचिंतन का भाव था। महिषासुर भी उनके सामने हथियार डाले नजर आया। इस अनूठी कल्पना ने पंडाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया था।
इस वर्ष समिति की 91वीं दुर्गापूजा का विषय था ‘अरब’, जिसका अंग्रेजी अर्थ ‘बियान्ड साउंड’ यानी ध्वनि से परे है। कलाकार सुशांत शिवानी पाल की परिकल्पना में तैयार इस आयोजन का मूल विचार था कि मनुष्य लगातार शोर से घिरा रहता है।
अपने भीतर की शांति और मौन को महसूस करने के लिए उसे उस शोर से परे जाना होगा। यह केवल ध्वनि की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुभूति है, जिसमें व्यक्ति खुद से और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ सके।
शोर से दूर, मौन की दुनिया में मां के दर्शन
पंडाल की खासियत केवल प्रतिमा तक सीमित नहीं थी। इसकी पूरी परिकल्पना 360 डिग्री के अनुभव के रूप में की गई थी। रोशनी और अंधेरे के संयोजन से ऐसा वातावरण रचने की कोशिश की गई, जो दर्शकों को बाहरी शोर से अलग एक शांत, आत्ममंथन वाले संसार में ले जाए। यहां नीरवता को खालीपन नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने और सृष्टि की गहराई को महसूस करने का माध्यम माना गया।
इस विचार में भगवद्गीता की उस आध्यात्मिक व्याख्या को भी महत्व दिया गया, जिसमें मौन को दैवी अनुभूति की भाषा और स्थिरता को आत्मबोध का माध्यम माना गया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां व्यक्ति लगातार शोर, तनाव और प्रतिस्पर्धा से घिरा रहता है, यह थीम उसे ठहरने और शांति तलाशने का संदेश दे रही थी। आयोजकों की कोशिश थी कि श्रद्धालु केवल देवी की प्रतिमा देखकर आगे न बढ़ें, बल्कि उस भाव को भी महसूस करें, जिसके साथ पूरा पंडाल तैयार किया गया था।
युद्ध नहीं, शांति का संदेश
आमतौर पर दुर्गा प्रतिमाओं में महिषासुर का वध करतीं मां की वीर और शक्तिशाली छवि दिखाई जाती है। चोरबागान में इस बार देवी का शांत रूप केंद्र में था। मां ध्यानमग्न थीं और उनके भक्त भी ध्यान की मुद्रा में दिखाए गए थे। महिषासुर को भी उनके सामने हथियार डालते हुए प्रस्तुत किया गया। इस दृश्य के जरिये हिंसा और शत्रुता के बजाय धैर्य, सद्भाव और शांति का संदेश देने की कोशिश की गई।
चोरबागान सार्वजनिन दुर्गोत्सव समिति इस वर्ष अपनी पूजा का 91वां साल मना रही थी। इतने पुराने आयोजन में इस तरह की वैचारिक प्रस्तुति ने इसे खास पहचान दी। कलाकार सुशांत शिवानी पाल की कल्पना ने पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों को एक अलग दृष्टि से देखने का अवसर दिया।
यही वजह थी कि पंडाल को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे थे। हालांकि, जिस पंडाल की परिकल्पना शांति और स्थिरता का संदेश देने के लिए की गई थी, वहीं शनिवार राम कई जिंदगियां शांत हो गईं।
इस त्रासदी ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है- क्या किसी पूजा की कलात्मक और वैचारिक भव्यता के साथ उतनी ही गंभीरता से भीड़ प्रबंधन की योजना भी बनाई गई थी? चोरबागान की थीम ने मनुष्य को शोर से दूर शांति तलाशने का संदेश दिया, लेकिन हादसे ने याद दिलाया कि उत्सव में आने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
किसी भी पंडाल की सफलता उसकी कल्पना और कलाकारी के साथ इस बात से भी तय होनी चाहिए कि वहां पहुंचने वाला प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित घर लौट सके।
