बंगाल क्रिकेट में बड़ा सियासी संग्राम, CAB चुनाव से पहले गांगुली और डालमिया परिवार आमने-सामने; भ्रष्टाचार के आरोप
बंगाल क्रिकेट संघ (कैब) में सौरव गांगुली और अभिषेक डालमिया के परिवारों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चल रही है। अभिषेक ...और पढ़ें

कैब की सियासत में आमने-सामने दो क्रिकेट परिवार
HighLights
कैब में गांगुली और डालमिया परिवारों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता।
अभिषेक डालमिया ने खिलाड़ियों के चयन में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
भाजपा विधायक ने खिलाड़ियों की उम्र में हेरफेर का मुद्दा उठाया।
विशाल श्रेष्ठ, जागरण कोलकाता। बंगाल क्रिकेट संघ (कैब) की सियासत में राज्य के दो प्रमुख क्रिकेट परिवार आमने-सामने हैं। एक तरफ भारत के सबसे सफल कप्तान सौरव गांगुली हैं, तो दूसरी ओर दिवंगत जगमोहन डालमिया के पुत्र अभिषेक डालमिया।
अभिषेक ने कैब पर खिलाड़ियों के चयन में रुपये लिए जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा विधायक रितेश तिवारी ने खिलाड़ियों की उम्र में हेरफेर का आरोप लगाकर विवाद को और बढ़ा दिया है। सौरव गांगुली ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है।
खेल मंत्री डा. इंद्रनील खां ने अभिषेक की शिकायत मिलने की पुष्टि करते हुए जांच कराने का आश्वासन दिया है। ऐसे में 24 सितंबर को होने वाली कैब की वार्षिक आमसभा पर सबकी नजरें हैं।
इस आमसभा में सचिव और संयुक्त सचिव पद के लिए चुनाव होना है। यदि विरोधी खेमा अपने उम्मीदवार उतारता है और उन्हें समर्थन मिलता है, तो कैब के भीतर शक्ति संतुलन में बदलाव के संकेत मिल सकते हैं।
पारिवारिक विरासत की लड़ाई
कैब की गतिविधियों पर नजर रखने वाले इसे सौरव और अभिषेक की ‘पारिवारिक विरासत की लड़ाई’ बता रहे हैं। जगमोहन डालमिया लंबे समय तक कैब अध्यक्ष रहे और बीसीसीआई तथा आईसीसी के अध्यक्ष पद तक पहुंचे।
दूसरी ओर, सौरव गांगुली के पिता चंडीदास गांगुली भी कैब के सचिव रह चुके हैं। डालमिया के निधन के चार दिन बाद 2015 में सौरव पहली बार कैब अध्यक्ष बने थे। उस समय अभिषेक को पिता की बागडोर नहीं मिली, बल्कि उन्हें संयुक्त सचिव बनाया गया। सौरव के अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने की थी।
2019 में सौरव दोबारा कैब अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए, लेकिन बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने कैब पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 2020 में अभिषेक डालमिया कैब अध्यक्ष बने। कूलिंग ऑफ अवधि के नियम के कारण उनका कार्यकाल 2022 तक रहा। इसके बाद सौरव के बड़े भाई स्नेहाशीष गांगुली ने कैब की बागडोर संभाली।
2025 में सौरव ने फिर अध्यक्ष पद पर वापसी की और निर्विरोध चुने गए। उनका मौजूदा कार्यकाल तीन वर्ष का है। फिलहाल सौरव की कुर्सी पर सीधा खतरा नहीं है, लेकिन सचिव और संयुक्त सचिव पद के लिए होने वाला चुनाव महत्वपूर्ण हो सकता है।
कुछ का यह भी कहना है कि सौरव पर बंगाल में पूर्ववर्ती सत्ताधारी पार्टी की कृपा थी, जिससे अभिषेक खेमा सक्रिय हुआ है। हालांकि, सौरव हमेशा खुद को राजनीति से दूर बताते आए हैं।दशकों से राजनीतिक प्रभाव में रहा है कैब कैब पर पिछले कई दशकों से राजनीतिक प्रभाव रहा है।
राजनेताओं और उनके करीबियों का यहां हस्तक्षेप देखने को मिला है। बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय भी एक समय कैब के अध्यक्ष रह चुके हैं। वाममोर्चा के शासनकाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने जगमोहन डालमिया के विरुद्ध कोलकाता पुलिस के पूर्व आयुक्त प्रसून मुखर्जी का खुलकर समर्थन किया था।
विश्लेषक भाजपा विधायक की ओर से लगाए गए आरोप को राजनीतिक हस्तक्षेप की ताजा कड़ी बता रहे हैं।
