बंगाल के पर्वतारोहियों ने लद्दाख की चार दुर्गम चोटियों पर फहराया तिरंगा, तीन पर पहली बार पड़े इंसान के कदम
पश्चिम बंगाल के 14 पर्वतारोहियों ने पूर्वी लद्दाख की चार दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचा, जिनमें 6,536 मीटर ऊंची चांग चेनमो कांगरी भी शामिल है।

पूर्वी लद्दाख की 6,420 मीटर ऊंची चोटी पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ बंगाल के पर्वतारोही। फोटो सौजन्य - सोनारपुर आरोही
HighLights
बंगाल के 14 पर्वतारोहियों ने पूर्वी लद्दाख की चार चोटियां फतह कीं।
'सोनारपुर आरोही' दल ने 'एल्पाइन' शैली में दुर्गम चढ़ाई पूरी की।
तीन चोटियों पर पहली बार मानव कदम, तिरंगा फहराकर इतिहास रचा।
विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता । चारों ओर बर्फ से ढके विशालकाय पहाड़। तापमान शून्य से 30 डिग्री नीचे। कहीं खड़ीं चट्टानें, तो कहीं 65 से 75 डिग्री तक की तीव्र ढलान। दुर्गम हिमनदों के बीच आक्सीजन की कमी और हाड़ कंपा देने वालीं हवाएं।
ऐसी विषम परिस्थितियों में बंगाल के 14 पर्वतारोहियों ने एक-दूसरे की कमर से बंधी रस्सी के सहारे ‘मानव श्रृंखला’ तैयार की और पूर्वी लद्दाख की चार दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया।
कोलकाता से सटे दक्षिण 24 परगना जिले की पर्वतारोहण संस्था ‘सोनारपुर आरोही’ के इस दल ने रुद्र प्रसाद हालदार के नेतृत्व में 6,536 मीटर ऊंची चांग चेनमो कांगरी समेत 6,420 मीटर, 6,400 मीटर व 6,274 मीटर ऊंची चोटियों पर सफलतापूर्वक कदम रखे।
दल के सदस्यों में सत्यरूप सिद्धांत, नैतिक नस्कर, देबाशीष मजूमदार, दीपाश्री पाल, वृकराज राय, राहुल हलदर, यास्मिना खान, तुहिन भट्टाचार्य, अपरेश शनिग्रही, मलय पुरकायत, रतन आचार्य, निरंजन पाल और अनिंद्य मुखर्जी शामिल हैं। इनमें दो महिलाएं हैं।
पर्वतारोहियों ने क्रमश: 9, 11, 16 और 20 सितंबर को अलग-अलग टीमों में बंटकर चारों चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की। कोलकाता से रवाना होने के बाद अभियान पूरा करने में कुल 35 दिन लगे।
कमर से बंधी रस्सी बनी सुरक्षा की ढाल
इस अभियान की सबसे खास बात चढ़ाई की शैली रही। पर्वतारोहियों ने ‘एल्पाइन’ शैली में आरोहण किया और कहीं भी ‘फिक्स्ड’ रस्सियों का इस्तेमाल नहीं दिया यानी चढ़ाई के दौरान उन्होंने पहाड़ के किसी भी हिस्से में रस्सी नहीं बांधी। शेरपा या सामान ढोने वालों की भी मदद नहीं ली। प्रत्येक पर्वतारोही अपनी कमर में रस्सी बांधकर आगे बढ़ा। सदस्यों के बीच लगभग पांच मीटर का फासला रखा गया।
रुद्र ने बताया कि इस शैली में यदि किसी सदस्य का संतुलन बिगड़ने पर बाकी सदस्य कमर से बंधी रस्सी के सहारे उसे संभालने का प्रयास करते हैं। इस तरह की चढ़ाई में प्रत्येक सदस्य की सतर्कता और टीम भावना की अहम भूमिका होती है। अभियान के दौरान कई बार सदस्यों का संतुलन बिगड़ा, लेकिन आपसी तालमेल और सामूहिक प्रयास से स्थिति को संभाल लिया गया।
आक्सीजन की कमी व बर्फीली हवाओं ने बढ़ा दी थीं मुश्किलें
पूर्वी लद्दाख का चांग चेनमो क्षेत्र अक्साई चिन के संवेदनशील सीमावर्ती इलाके के निकट स्थित है। यहां पर्वतारोहण के लिए शारीरिक व तकनीकी दक्षता के साथ प्रशासनिक अनुमति तथा सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन भी जरूरी है। दल ने भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन और रक्षा मंत्रालय से आवश्यक स्वीकृतियां लेने के बाद अभियान शुरू किया था।
प्रतिबंधित क्षेत्र में आवाजाही के लिए जरूरी अनुमति और पहचान संबंधी विवरण सेना की चौकियों पर भी जमा कराए गए थे। रुद्र ने बताया कि अभियान के दौरान अत्यधिक ठंड, आक्सीजन और पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौतियां रहीं। ऊंचाई पर सांस लेने में काफी परेशानी हुई। हाड़ कंपाने वाली बर्फीली हवाओं ने भी कठिन परीक्षा ली।
पानी जुटाने के लिए कई बार करीब 400 मीटर पैदल चलना पड़ा। कुछ मौकों पर हिमनद से बर्फ लाकर उसे आग जलाकर पिघलाना पड़ा। एक और बड़ी चुनौती पर्वत श्रृंखलाओं का सटीक मानचित्र न होने की भी थी। दल को काफी अनुमान लगाकर आगे बढ़ना पड़ा। दल के अनुसार, चांग चेनमो कांगरी पर इससे पहले भारतीय सेना के जवान चढ़ाई कर चुके हैं।
अन्य तीन चोटियों पर इससे पहले किसी के पहुंचने की जानकारी उन्हें नहीं मिली। दल ने केंद्र सरकार के समक्ष इन चोटियों का नामकरण एवरेस्ट पर पहली सफल चढ़ाई करने वाले तेनजिंग नोर्गे व एडमंड हिलेरी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर करने का प्रस्ताव रखा है।
अभियान का एक उद्देश्य पूर्वी लद्दाख के दुर्गम हिमनदों और पर्वत शृंखलाओं का सर्वेक्षण करना तथा भविष्य के पर्वतारोहण अभियानों के लिए संभावित मार्गों की जानकारी जुटाना भी था।
