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बंगाल सीमा के जरिये सालाना 900 करोड़ के घुसपैठ नेटवर्क पर लगी रोक, 1000 ‘घाटों’ से चल रहा था अवैध कारोबार

Published: Tue, 16 Jun 2026 11:23 PM (IST)

पश्चिम बंगाल में एक पूर्व दलाल ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर 800-900 करोड़ रुपये के सालाना घुसपैठ नेटवर्क का खुलासा किया ...और पढ़ें

बंगाल सीमा के जरिये सालाना 900 करोड़ के घुसपैठ नेटवर्क पर लगी रोक।

बंगाल सीमा के जरिये सालाना 900 करोड़ के घुसपैठ नेटवर्क पर लगी रोक।

HighLights

  1. पूर्व दलाल ने 900 करोड़ के घुसपैठ नेटवर्क का खुलासा किया।

  2. 1000 'घाटों' से होती थी अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ।

  3. फर्जी पहचान पत्र बनाने का समानांतर नेटवर्क भी सक्रिय था।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सीमावर्ती उत्तर 24 परगना जिले के एक पूर्व दलाल के सनसनीखेज दावों ने सीमा पार घुसपैठ के कथित संगठित नेटवर्क की तस्वीर सामने रख दी है।

अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर उसने दावा किया कि वर्षों तक भारत-बांग्लादेश सीमा के विभिन्न ‘घाटों’ के जरिए अवैध घुसपैठ कराई जाती रही और इस कारोबार का वार्षिक आकार 800 से 900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

पूर्व दलाल का दावा है कि पिछले करीब 20 साल से यह धंधा चल रहा था, लेकिन नवंबर, 2025 में राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया शुरू होने और पिछले महीने हुए सत्ता परिवर्तन व भाजपा सरकार बनने के बाद बदली परिस्थितियों के मद्देनजर यह कारोबार लगभग ठप पड़ गया है।

भारत-बांग्लादेश सीमा सीमा से लगे स्वरूपनगर क्षेत्र के रहने वाले इस पूर्व दलाल के अनुसार, उत्तर 24 परगना से लेकर मालदा और मुर्शिदाबाद तक सीमा के किनारे सैकड़ों ऐसे स्थान थे (स्थानीय भाषा में घाट, जिनकी संख्या लगभग 1,000 थी), जहां से निगरानी कम होने पर लोगों को सीमा पार कराया जाता था।

उसने दावा किया कि सीमा पार कराने के लिए बांग्लादेशी पक्ष के एजेंट प्रत्येक व्यक्ति से करीब 15 हजार टका वसूलते थे। इनमें भारत की तरफ सक्रिय नेटवर्क को लगभग तीन हजार रुपये प्रति व्यक्ति मिलते थे। इस पूरे नेटवर्क में कई स्तरों पर लोगों की भागीदारी रहती थी। सीमा के दोनों तरफ सक्रिय एजेंटों का पूरा नेटवर्क काम करता था।

मौका मिलते ही घुसपैठियों को करा दिया जाता था सीमा पार

उसके मुताबिक, बांग्लादेश की ओर मौजूद नेटवर्क पहले यह तय करता था कि किस समय और किस मार्ग से लोगों को भेजना सुरक्षित रहेगा। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) की निगरानी से बचाकर लोगों को सीमा तक लाया जाता था। इसके बाद भारतीय सीमा के निकट मौजूद ‘लाइनमैन’ बीएसएफ की गश्त व गतिविधियों पर नजर रखते थे और मौका मिलते ही घुसपैठियों को सीमा पार करा दिया जाता था।

भारतीय सीमा में घुसपैठ कराने के बाद उन्हें बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और फिर कोलकाता जैसे शहरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी स्थानीय दलालों और उनके सहयोगियों की होती थी। इसका अलग से पैसा लिया जाता था।

हर महीने 70 से 80 करोड़ रुपये का लेनदेन

पूर्व दलाल के अनुसार, केवल उसके इलाके के पांच घाटों से प्रतिदिन औसतन 30-35 लोगों की आवाजाही होती थी। इसी आधार पर उसके अनुमान के मुताबिक, पूरे राज्य में करीब एक हजार सक्रिय घाटों के जरिए हर महीने 70 से 80 करोड़ रुपये का लेनदेन होता था, जो सालाना 800-900 करोड़ रुपये तक पहुंचता था। उसके अनुसार, घुसपैठ केवल सीमा पार कराने तक सीमित नहीं थी।

फर्जी भारतीय पहचान पत्र मुहैया कराने का समानांतर नेटवर्क भी था सक्रिय

घुसपैठियों के भारत में स्थायी रूप से बसने के लिए फर्जी जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, वोटर कार्ड और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज मुहैया कराने का समानांतर नेटवर्क भी सक्रिय था। इसके लिए कुछ भ्रष्ट पंचायत और नगर निकाय प्रतिनिधियों की मदद ली जाती थी, जो कथित तौर पर रुपये लेकर जाली प्रमाणपत्र जारी करते थे।

एक पुलिसकर्मी ने भी नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि उत्तर 24 परगना के एक पूर्व पंचायत प्रधान ने पद छोड़ने के बाद भी पुराने लेटरहेड का इस्तेमाल कर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए।

आरोप है कि पुराने दस्तावेज जैसा दिखाने के लिए कागज को कृत्रिम रूप से पुराना बनाया जाता था और बाद में उसे सरकारी दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। पूर्व दलाल का दावा है कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद निगरानी बढ़ने और दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया सख्त होने से घुसपैठ तथा उससे जुड़े फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क को बड़ा झटका लगा है।