जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। एक फिल्म का मशहूर डॉयलग है 'हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं।' परंतु, बंगाल के चुनावी रण में यहां सिर्फ जीतने वाला ही 'बाजीगर' कहलाएगा। क्योंकि, इस बार विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। इसमें कौन जीतकर बाजीगर बनता है यह दो मई को पता चल जाएगा। 34 वर्षों के वामपंथी शासन को ममता बनर्जी ने अंत कर सत्ता पर काबिज हुई थी। उस समय ममता को 'बाजीगर' कहा गया था। क्योंकि, जो कार्य कांग्रेस नहीं कर पाई थी वह काम ममता ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस गठित करने के महज 13 वर्ष के अंदर कर दिखाया था।

परंतु, आज उसी बंगाल में मुख्यमंत्री व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को भाजपा से कड़ी चुनौती ही नहीं मिल रही है। बल्कि आज हालत यह है कि भााजपा सत्ता की रेस में तृणमूल के बराबरी में खड़ी है। विधानसभा चुनाव के सभी आठों चरणों का मतदान संपन्न हो चुका है और एक्जिट पोल के नतीजे आ चुके हैं। हालांकि, असली चुनाव परिणाम तो दो मई को आएगा। परंतु, एक्जिट पोलों में जिस तरह से बंगाल की धरती पर तृणमूल और भाजपा में कांटे की टक्कर बताया गया है, उससे से सबके मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि आखिर कौन बाजी मार ले जाएगा। कुछ एक्जिट पोल में भाजपा को तो कुछ में तृणमूल को बढ़त दिखाया गया है।

तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम में ममता को मैदान में उतारकर बड़ा दांव खेला है तो दूसरी ओर भाजपा ने बिना चेहरे के मैदान में उतकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे चुनाव जीतने की बाजी खेली है। यदि तृणमूल जीतती है तो या फिर भाजपा जीतती है तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। भाजपा जीत जाती है तो इसका श्रेय भाजपा के कद्दावर नेता व गृहमंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा व उनकी टीम की कड़ी मेहनत को जाएगा और ममता जीतती है तो इसका श्रेय उनकी कड़ी मेहनत और रणनीतिकार प्रशांत किशोर की रणनीति को जाएगा।

नरम हिंदुत्व और तुष्टीकरण पर दांव

बात पहले भाजपा की। अमित शाह ने चार वर्ष पहले पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में कहा था कि भाजपा के लिए स्वर्ण युग उस समय शुरू होगा जब बंगाल, ओडि़शा और केरल में कमल खिलेगा। उसी अनुसार 2017 के बाद से ही कमल के लिए बंगाल की धरती को उर्वरा बनाने में शाह और उनकी टीम जुट गई थी। दो दिन बाद जब चुनाव परिणाम आएंगे तो अमित शाह और उनकी टीम तथा पीएम मोदी का दांव कितना सफल हुआ इसका पता चल जाएगा। परंतु, ममता बनर्जी भी एक ऐसी नेता हैं जो अंतिम घड़ी तक लड़ती हैं। उनका यही जुझारू तेवर उन्हें सीएम के पद तक पहुंचाया है। ऐसे में भाजपा के लिए राह आसान नहीं है। परंतु, मुस्लिम तुष्टीकरण, घुसपैठ, एनआरसी, नागरिकता बिल, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों पर भाजपा ने तृणमूल प्रमुख को घेरा है। पीएम मोदी ने बंगाल में 18 जनसभाएं की, जो बिहार और झारखंड के विधानसभा चुनाव से भी सर्वाधिक है।

यही नहीं पहली बार भारत के किसी पीएम ने बंगाल में इतनी अधिक चुनावी रैलियां की है। ममता ने भी भाजपा को बंगाल में पांव न जमे इसके लिए हर ऐसे मुद्दों को उठाया जिससे लोगों को परेशानी हुई थी। बाहरी, गुजरात की पार्टी, सांप्रदायिक, दंगाई, कोरोना फैलाने वाले जैसे मुद्दों को हवा दी। तुष्टीकरण के आरोपों का जवाब चंडीपाठ और 25 से अधिक मंदिरों का दौरा कर दिया। अपना गोत्र और ब्राह्मण बताने से भी ममता नहीं चूकीं। पीएम मोदी व शाह पर व्यक्तिगत हमले भी किए। दो-तिहाई सीटें जीतने का लक्ष्य ममता ने निर्धारित किया था। परंतु, जब एक्जिट पोल में भाजपा के तीन संख्या में पहुंचने की बातें सामने आई तो तृणमूल ने एक्जिट पोल को गपशप करार दिया। खैर जो भी मोदी व ममता ने दांव खेल चुका है इसमें कौन सियासी बाजी जीतकर बाजीगर कहलाता है यह दो को पता चल जाएगा। वहीं वाममोर्चा-कांग्रेस ने मुस्लिम धर्मगुरु पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट(आइएसएफ) को साथ लेकर दांव खेला तो पीरजादा ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से साथ जोड़कर दांव लगाया।