कोलकाता, जयकृष्ण वाजपेयी। Bengal Chunav हम सभी सामान्य रूप में बचपन से सुनते आए हैं कि हम भी खेलेंगे या फिर खेल होगा। परंतु बंगाल के चुनावी रण में खेला हबे एक अन्य निहितार्थ के साथ चुनावी नारा बन चुका है। इस नारे का बंगाल के विधानसभा चुनाव में अचानक आमद कहां से हुआ? इस बात की जानकारी जब हमने जुटाने की कोशिश की तो पता चला कि दरअसल यह पड़ोसी देश बांग्लादेश से आयातित है। बांग्लादेश के सत्तारूढ़ दल अवामी लीग के सांसद शमीम उस्मान का यह राजनीतिक नारा इस समय बंगाल में लोगों की जुबान पर चढ़ चुका है।

चुनाव प्रचार में सिर्फ सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि अन्य दलों द्वारा खेला हबे का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। उस्मान ने यह नारा एक सकारात्मक मुद्दे को लेकर दिया था। परंतु बंगाल में इसके संदर्भ और मायने ही बदल गए। वैसे तो बंगाल के चुनावी मौसम में खूब नए-नए नारे तैयार होते रहे हैं। बंगाल में इस समय- आर नोय तृणमूल (और तृणमूल नहीं), हय येबार नय नेभार (या तो इस बार, नहीं तो कभी नहीं), चुपचाप फूले छाप, जय श्रीराम, जय बांग्ला जैसे नारे सुनने को मिल रहे हैं, लेकिन जो नया नारा इस चुनाव से पहले ही हर तरफ गूंज रहा है, वह बिल्कुल अलग है।

दरअसल एक साल पहले बांग्लादेश के नारायणगंज की अवामी लीग के नेता शमीम उस्मान ने एक सियासी सभा में कहा था- कारे खेला सेखान (किसे खेल सिखा रहे हैं)? आमरा तो छोटबेलार खेलोआर (हमलोग तो बचपन से ही खिलाड़ी हैं)। खेला हबे। पूरी लाइन नहीं बल्कि आखिर के दो शब्द इस समय बंगाल में तृणमूल और भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, बल्कि वामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं के मुंह से भी सुने जा रहे हैं। यहां तक कि गाने भी बन गए हैं और खेला हबे डीजे की धुन पर जुलूस और बाइक रैली निकाली जा रही है।

पहले यह नारा किसने दिया, इस पर विवाद हो सकता है। परंतु बंगाल में जिसकी वजह से यह नारा लोगों की जुबान पर चढ़ा है, उसका नाम बीरभूम जिले के तृणमूल अध्यक्ष और बाहुबली नेता अनुब्रत मंडल है। मंडल तो शमीम उस्मान से भी एक कदम आगे निकल गए और कहा- पूरे बंगाल में खेल होगा। भयंकर खेल होगा। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुंह से भी सुनने को मिल रहा है, खेला हबे और हो नाक एक खेल (एक खेल हो जाए)। मैं गोल रक्षक हूं। देखते हैं कौन कितना गोल मारता है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष, नेता सुवेंदु अधिकारी से लेकर तृणमूल के नेता, विधायक और कार्यकर्ता तक खेला हबे नारे से लेकर दीवार लेखन तक करने लगे हैं। यहां तक कि इस मामले में वामपंथी भी पीछे नहीं हैं।

खेला हबे यानी खेल होगा सिर्फ नारा है तो इस पर किसी को एतराज नहीं होगा, परंतु इसे विरोधियों के खिलाफ हिंसा और मतदान के दौरान हमले के संकेत के रूप में देखा जाता है, तो यह बड़ी चिंता का विषय है। क्योंकि अनुब्रत मंडल ने जिस तरह से कहा कि भयंकर खेला होगा, इसके बाद तुरंत बीरभूम जिले में तृणमूल की बाइक रैली निकलने लगी, जिसे विरोधियों को डराने का हथियार माना जाता है, यह सही नहीं है। यही वजह है कि सूबे के सियासतदान खेला हबे नारे के अलग-अलग मायने और निहितार्थ निकाल रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? इसकी बड़ी वजह बंगाल में जारी सियासी हिंसा है। आज हालत यह है कि चुनाव की घोषणा से पहले ही निर्वाचन आयोग को बंगाल में केंद्रीय बलों को तैनात करना पड़ रहा है। अभी चार दिन पहले मुर्शीदाबाद में निमतिता रेलवे स्टेशन पर बंगाल के श्रम राज्य मंत्री जाकिर हुसैन पर बम से हमला किया गया। वह गंभीर रूप से जख्मी हैं। उन पर हमला किसने और क्यों किया, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है।

मुख्यमंत्री ने इसे साजिश बता दिया है। परंतु इस घटना के महज पांच दिन पहले ही उत्तर 24 परगना जिले के मिनाखा में भाजपा नेता बाबू मास्टर की गाड़ी रोककर उन पर बम और गोलियों से हमला किया गया। इतना ही नहीं, शनिवार को भी इसी इलाके में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के काफिले पर भी हमला हुआ। इसी बीच जब दक्षिण 24 परगना जिले के भांगड़ के एक तृणमूल नेता यह कहते हैं कि खेला हबे, केंद्रीय बल क्या कर लेगा। तृणमूल को जो वोट देगा वही मतदान कर पाएगा। इससे साफ हो जाता है कि इस नारे का अर्थ क्या है? इस तरह के माहौल के बीच चुनाव आयोग के लिए बंगाल में निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और निर्बाध मतदान कराना बड़ी चुनौती है।

पिछले माह जब निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ बंगाल आई थी तो उस समय भी विपक्ष ने कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने बंगाल में निष्पक्ष, निर्बाध और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा था, विधानसभा चुनाव में धनबल और बाहुबल को किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, बंगाल]

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