रमण शुक्ला। राजनीतिक रूप से जागरूक बिहार में भाजपा ने रेणु देवी को महिला उपमुख्यमंत्री बनाकर बड़ा सियासी संदेश दिया है। इस एक पहल से पार्टी ने एक साथ कई प्रदेशों को साधने का उपक्रम किया है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो रेणु देवी बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकती हैं। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश के नोनिया बिरादरी के मतदाताओं के बीच भी उनको यह महत्वपूर्ण ओहदा देने से सकारात्मक संदेश जाएगा, जो भाजपा के लिए लाभप्रद होगा।

बेतिया से पांचवीं बार विधायक चुनी गईं रेणु देवी ने अपना राजनीतिक सफर विश्व हंिदूू परिषद की दुर्गावाहिनी से शुरू किया था। वर्ष 1988 में वे दुर्गावाहिनी की जिला संयोजक बनाई गईं। बीए तक शिक्षा ग्रहण करने वाली नोनिया समाज की वह प्रतिनिधि चेहरा बन चुकी हैं। हंिदूी, अंग्रेजी और भोजपुरी के साथ बांग्ला भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है। उन्हें पिछड़ा एवं अति पिछड़ा विभाग, पंचायती राज विभाग व उद्योग विभाग का दायित्व सौंपा गया है।

एक नवंबर, 1959 को पैदा हुईं रेणु देवी का बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव रहा है। जीविकोपार्जन के लिए एक निजी बीमा कंपनी की एजेंट रहीं। कोलकाता के संतरागाछी इलाके में उनकी ससुराल है। पति दुर्गा प्रसाद के असामयिक निधन के बाद वे मायके में अपने पिता के साथ रहने लगीं। पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया में उनका मायका है और वही उनका विधानसभा क्षेत्र भी। वर्ष 1981 में सामाजिक जीवन में उनका पदार्पण हुआ। पश्चिम चंपारण और उत्तर बिहार को कार्यक्षेत्र बनाकर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने की उन्होंने यहीं से शुरुआत की।

राम मंदिर आंदोलन भागीदारी : रेणु देवी ने राम मंदिर आंदोलन में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। करीब 500 महिला कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने गिरफ्तारी दी थी। वर्ष 1989 में वे भाजपा महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष चुनी गईं। वर्ष 1990 में तिरहुत प्रमंडल में महिला मोर्चा का उन्हें प्रभारी बनाया गया, जबकि 1991 में प्रदेश महिला मोर्चा की महामंत्री बनीं। 1992 में जम्मू-कश्मीर तिरंगा यात्र में वह शामिल हुईं। 1993 में भाजपा बिहार प्रदेश महिला मोर्चा का उन्हें अध्यक्ष चुना गया। 1996 में फिर महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनीं। उनकी संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए पार्टी ने 2014 में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। अभी वह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के सदस्य के रूप में कार्य कर रही हैं।

पहले चुनाव में मिली थी मात : रेणु देवी पहली बार 1995 में नौतन विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं। वर्ष 2000 में बेतिया विधानसभा सीट से वह विजयी रहीं। 2005 के फरवरी और नवंबर में बेतिया से फिर वह विधायक चुनी गईं। पहली बार 2007 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में उन्हें कला-संस्कृति व युवा मामलों के मंत्रलय की जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 2010 में भी वह विधानसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं। हालांकि 2015 के विधानसभा चुनावों में सियासी समीकरण बदलने से वह कांग्रेस के मदन मोहन तिवारी से हार गईं, लेकिन इस बार उन्हें ही मात देकर वह विधानसभा पहुंची हैं।

अति पिछड़ा समाज को जोड़ा : उन्होंने बिहार में नोनिया, मल्लाह, तुरहा आदि जाति को पार्टी की विचारधारा से जोड़ा। राष्ट्रीय स्तर पर अति पिछड़ा वर्ग की मजबूत उप जातियों नोनिया (चौहान), उपहारा/ सागरा, लबाना (पंजाब), सदर समाज (गुजरात) के बीच जाकर अलख जगाते हुए उन्हें भाजपा के पक्ष में एकजुट किया।

साधा जा रहा सियासी समीकरण : राज्य चुनाव में जातीय समीकरणों से ही शह-मात तय होती है। इस लिहाज से देखें तो भाजपा ने राजनीतिक दूरदृष्टि के तहत 2024 में लोकसभा और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी बिसात बिछा दी है। रेणु देवी को आगे लाकर भाजपा ने अति पिछड़ा वर्ग के साथ महिला मतदाताओं को सियासी संदेश दिया है। बिहार राजग में बड़े भाई की भूमिका में आने के बाद भाजपा अब नंबर वन पार्टी बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। भाजपा की नजर सीधे-सीधे लालू यादव के वोट बैंक में शामिल बताए जा रहे अति पिछड़ा पर है। महिला मतदाताओं पर उसका पहले से ही फोकस रहा है। इसी समीकरण के मद्देनजर रेणु को भाजपा ने विधायक दल के उप नेता की जिम्मेदारी दी है। आने वाले दिनों वह अति पिछड़ा वर्ग को भाजपा की विचारधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

हालिया चुनाव में सर्वाधिक 75 सीटों पर राजद ने परचम लहाराया है। भाजपा 74 सीटें जीत कर दूसरे नंबर पर रही। जदयू के साथ मिलकर भाजपा ने बेशक सरकार बना ली है, लेकिन वोट प्रतिशत में उसे पिछली बार की तुलना में नुकसान हुआ है। इस मामले में महागठबंधन को फायदा हुआ है। भाजपा को 2005 के फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में 10.97 फीसद वोट मिले थे और यह बढ़त 2015 तक जारी रही। मतों की यह संख्या 2015 में दोगुना से ज्यादा बढ़कर 24.42 फीसद तक पहुंच गई। लेकिन 2020 के चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत गिरकर 19.46 फीसद पर आ गया है। 

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