बंगाल चुनाव में वादों की जंग: 'दीदी की प्रतिज्ञा' बनाम भाजपा की 'शपथ'
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी तपिश बढ़ गई है। मुकाबला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ...और पढ़ें
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वेलफेयर मॉडल और परिवर्तन के वादों के बीच मुकाबला तेज (फाइल फोटो)
HighLights
ममता की 'दस प्रतिज्ञाएं' कल्याणकारी योजनाओं पर केंद्रित।
भाजपा का 'भरसार शपथ' भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा।
पीएम मोदी की छह गारंटियां चुनावी संघर्ष को रोचक बनातीं।
जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। बंगाल की राजनीति में नारों और वादों का शोर अब निर्णायक मोड़ पर है। विधानसभा चुनाव के दोनों ही चरणों की नामांकन प्रक्रिया संपन्न होते ही चुनावी तपिश चरम पर पहुंच गई है।
मुकाबला अब दो स्पष्ट ध्रुवों के बीच है-एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यानी दीदी की 'दस प्रतिज्ञाएं' रूपी घोषणा पत्र हैं, जो उनके 15 वर्षों के शासन की निरंतरता और जनकल्याण पर आधारित हैं, तो दूसरी ओर भाजपा का 'भरसार शपथ' (भरोसे की शपथ) वाला संकल्प पत्र है, जो सत्ता परिवर्तन और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का आह्वान कर रहा है।
पीएम मोदी की छह गारंटियां
इससे पहले गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दी गई 'छह गारंटियों' ने इस संघर्ष को और भी रोचक बना दिया है। ममता का 'वेलफेयर प्लस स्थिरता' माडल तृणमूल कांग्रेस की रणनीति अपनी पुरानी योजनाओं के विस्तार और साख पर टिकी है।
ममता ने चुनाव घोषणा के चार दिनों बाद ही अपनी 'दस प्रतिज्ञाएं' वाला घोषणा पत्र पेश कर बढ़त लेने की कोशिश की। उनके घोषणापत्र का केंद्र ¨बदु 'दुआरे चिकित्सा', 'लक्ष्मी भंडार की राशि में वृद्धि और युवाओं के लिए 'युवा साथी' जैसी आर्थिक सहायता योजनाएं हैं।
किसानों के लिए बड़ा बजट और हर परिवार को पक्का घर व नल से जल देने का वादा सीधे तौर पर ग्रामीण और महिला वोटरों को साधने की कोशिश है। तृणमूल का तर्क है कि केंद्र की कथित उपेक्षा के बावजूद बंगाल विकास की राह पर है और उनकी प्रतिज्ञाएं 'बंगाल के स्वाभिमान' का प्रतीक हैं।
भाजपा का 'परिवर्तन और सुरक्षा' का दांव दूसरी ओर, भाजपा का संकल्प पत्र 'भरोसे की शपथ' सीधे तौर पर सत्ता विरोधी लहर को आवाज दे रहा है। भाजपा का घोषणापत्र केवल वादों का पु¨लदा नहीं, बल्कि ममता सरकार के विरुद्ध एक आरोप पत्र की तरह पेश किया गया है।
इसमें भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। भाजपा ने 'भय नहीं, भरोसा' का नारा देते हुए महिलाओं और युवाओं को तृणमूल से बेहतर आर्थिक लाभ देने का वादा किया है।
भाजपा का चुनावी प्लान
मोदी की छह गारंटियां-जिसमें केंद्रीय योजनाओं का सीधा लाभ, औद्योगिक निवेश और घुसपैठ पर लगाम शामिल है- मध्यम वर्ग और युवाओं को 'सोनार बांग्ला' के पुनरुद्धार का सपना दिखा रही हैं। निर्णायक मोड़ पर साइलेंट वोटर अब असली चुनौती बंगाल के उस 'साइलेंट वोटर' को अपनी ओर खींचने की है, जो जमीनी बदलाव की तलाश में है।
मतदाताओं के सामने एक तरफ दीदी का परखा हुआ नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं का सुरक्षा कवच है, तो दूसरी तरफ मोदी की वह गारंटी है जिसे भाजपा 'विकास का डबल इंजन' बता रही है। चुनावी बिसात बिछ चुकी है और मोहरे अपनी चालें चल रहे हैं।
चार मई को जब जनता अपना फैसला सुनाएगी, तो वह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं होगा, बल्कि बंगाल के भविष्य की नई इबारत होगी। फिलहाल सवाल यही है-जनमानस 'प्रतिज्ञा' पर भरोसा जताएगा या 'शपथ' को अवसर देगा?
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