दुर्गापूजा के बहाने बंगाल में सियासी जमीन मजबूत करने उतरेंगे अमित शाह, 17 अक्टूबर को पहुंचेंगे कोलकाता
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दुर्गापूजा के दौरान कोलकाता का विस्तृत दौरा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
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अमित शाह का दुर्गापूजा में कोलकाता का विस्तृत दौरा।
HighLights
अमित शाह का दुर्गापूजा में कोलकाता का विस्तृत दौरा।
भाजपा का बंगाल में सांस्कृतिक, सामाजिक संपर्क मजबूत करना।
आगामी चुनावों के लिए सियासी जमीन तैयार करने का अवसर।
इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली दुर्गापूजा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कोलकाता में विस्तृत भ्रमण राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 17 अक्टूबर की रात कोलकाता पहुंचने के बाद 18 अक्टूबर को उनका बेलूड़ मठ से शोभाबाजार राजबाड़ी तक विभिन्न पूजा पंडालों में जाने का कार्यक्रम है।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब भाजपा राज्य की सत्ता में है और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस विपक्ष में। ऐसे में पूजा पंडालों के जरिये आम लोगों के बीच उपस्थिति दर्ज कराना भाजपा के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक संपर्क मजबूत करने का अवसर है।
चुनावी राजनीति और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने वाले गृह मंत्री द्वारा दुर्गोत्सव के दौरान बंगाल में इतना समय देना काफी मायने रखता है। शाह के कार्यक्रम में बेलूड़ मठ, बाली का देशबंधु क्लब, चेतला की 24 पल्ली पूजा, शोभाबाजार राजबाड़ी और विधाननगर का श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब शामिल हैं।
इन स्थलों के जरिये आध्यात्मिक परंपरा, बंगाल की ऐतिहासिक विरासत और कोलकाता की सार्वजनिक दुर्गापूजा संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलेगा। मालूम हो कि पिछले वर्ष शाह ने संतोष मित्रा स्क्वायर की पूजा का उद्घाटन किया था और साल्टलेक स्थित ईजेडसीसी में आयोजित पूजा में भी भाग लिया था। इस बार इन दोनों स्थानों के बजाय दूसरे प्रमुख आयोजनों को कार्यक्रम में जगह मिली है।
आगामी चुनावों के बीच बंगाल का महत्व
वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में शाह का बंगाल दौरा ध्यान खींचता है। सरकार चलाने के साथ संगठन को मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क बढ़ाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती होगी।
शाह की मौजूदगी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच राजनीतिक समन्वय का संकेत भी मानी जा सकती है। तृणमूल कांग्रेस के सामने सत्ता से बाहर होने के बाद अपने जनाधार और संगठन को संभालने की चुनौती है। शाह के दौरे का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि उत्सव के बाद भाजपा इस जनसंपर्क को संगठनात्मक मजबूती और शासन की उपलब्धियों में कितना बदल पाती है।
