- सिंगुर में कल-कारखाने की मांग पर ममता को घेरेगी डीवाइएफआइ तो 22 अगस्त को सीटू का श्रम विभाग व नवान्न घेराव अभियान

जागरण संवाददाता, कोलकाता : कभी राज्य में माकपा के अभेद किले को भेदने वाला सिगुर आज फिर से सुर्खियों में है, लेकिन तब और अब में काफी अंतर आ गया है और आज सिंगुर पर भाजपा का कब्जा है। लोकसभा चुनाव के दौरान कल-कारखानों की स्थापना का दावा कर भले ही भाजपा ने यहां जीत दर्ज कर ली हो, लेकिन माकपा अपने इस किले पर कब्जा को लेकर फिर से सक्रिय हो गया है और वाममोर्चा युवा संगठन डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया व एसएफआइ सरीखे छात्र संगठनों ने राज्य की ममता सरकार और भाजपा के अनैतिक नीतियों को केंद्र कर आगामी 12 व 13 सितंबर को सिंगुर से राज्य सचिवालय नवान्न तक जुलूस निकाल विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। वहीं सियासी जानकारों की मानें तो एक बार फिर पार्टी नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य के निर्धारित मार्ग पर लौटने की जरूरत महसूस की है। डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष सायनदीप मित्रा ने कहा कि फोन पर चर्चा से कुछ होना जाना नहीं है। अब तो आमने-सामने होंगे। वहीं उन्होंने कहा कि सिंगुर का मतलब हमारे लिए अपराध नहीं है, बल्कि हम सिंगुर में कल-कारखाना और लोगों के लिए काम की मांग कर रहे हैं और इस मसले पर मुख्यमंत्री को हमसे से सीधे बात करनी चाहिए। फोन पर 'दीदी को बोलो' तो तृणमूल का सियासी स्टंट है। इधर, वाम श्रमिक संगठन सीटू ने भी आगामी 22 अगस्त को राज्य श्रम कार्यालय व सचिवालय घेराव की योजना बनाई है। सीटू नेता सुभाष मुखर्जी ने कहा कि मौजूदा समय में राज्य में रोजगार की भारी किल्लत है और मुख्यमंत्री 'दीदी को बोलो' व समस्याओं से उन्हें अवगत कराने की बात कह रही है। क्या मुख्यमंत्री को समस्याओं की जानकारी नहीं है? असल में राज्य के श्रमिकों व आम लोगों को ममता सरकार छलने में लगी हुई है, लेकिन हम इसके खिलाफ सड़क पर उतर विरोध प्रदर्शन करेंगे। दरअसल, 2009 में वरिष्ठ माकपा नेता व सिंगुर के सांसद रूपचंद्र पाल को पराजित कर तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार रत्ना नाग ने इस सीट पर कब्जा कर लिया था। इस हार के बाद माकपा के अंत की शुरुआत हुई व 2011 आते-आते वाम शासन का पूरी तरह से खात्मा हो गया और ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि हार के बाद पार्टी केंद्रीय कमेटी की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने साफ कहा था कि अगर राज्य में कल-कारखाने नहीं होंगे तो यहां के बच्चे भला कहां जाएंगे? लेकिन तब पार्टी केंद्रीय नेतृत्व ने उनके फैसले को यह कहते हुए गैर जायज करार दिया कि खेती की जमीन पर कारखाने की चाह ने पार्टी को खत्म कर दिया। इधर, समय के साथ राज्य में बढ़ती रोजगार की मांग के बीच एक बार फिर से बुद्धदेव सही साबित हुए हैं और आज पार्टी उनके दिखाए मार्ग पर लौटने को मजबूर है। बुद्धदेव के जिस दावे ने उन्हें सत्ता से बेदखल करने का काम किया। आज उसी दावे की दुहाई पर भाजपा ने यहां जीत दर्ज की और तृणमूल उम्मीदवार रत्ना नाग को पराजित कर भाजपा प्रत्याशी लॉकेट चटर्जी संसद पहुंची हैं। यहां तक की तृणमूल छोड़ भाजपा में शामिल हुए मुकुल रॉय ने भी इस बात को स्वीकार किया कि यहां से टाटा का जाना राज्य के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। खैर, कभी पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य को सवालों के कठघरे में खड़ा करने वाले अलीमुद्दीन के नेता आज उनके शरण में हैं और उन्हें उनके दिखाए मार्ग से आस है लेकिन आज बुद्धदेव अपनी शारीरिक अस्वस्थता के कारण घर की चारदीवारियों में कैद रहने को मजबूर हैं।

आज़ादी की 72वीं वर्षगाँठ पर भेजें देश भक्ति से जुड़ी कविता, शायरी, कहानी और जीतें फोन, डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Jagran